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क्या गांधी परिवार से बाहर कोई कांग्रेस का नेतृत्व कर सकता है?

कांग्रेस के सिस्टम ने भी उसके भीतर नेता बनने की संभावना सीमित कर दिया है. उसे समाप्त कर दिया है.

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राहुल गांधी ने आज अपने ट्विटर अकाउंट का परिचय बदल लिया. कांग्रेस अध्यक्ष हटा दिया और वहां कांग्रेस का सदस्य और सांसद लिख दिया है. उन्होंने तीन पन्नों की चिट्ठी भी सार्वजनिक कर दी है. जिसमें अपना इस्तीफा लिखा है. अब राहुल गांधी की जगह एक महीने के लिए मोतिलाल वोरा को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है. कांग्रेस के संविधान के अनुसार किसी कारणवश कांग्रेस के अध्यक्ष पद का इस्तीफा हो जाता है तब वरिष्ठ महासचिव को अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभालनी होती है. तब तक जब तक कार्यसमिति अस्थायी अध्यक्ष का चुनाव नहीं करती है. यह अस्थायी अध्यक्ष तब तक होता है जब तक स्थायी रूप से अध्यक्ष का चुनाव नहीं हो जाता है. राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर नहीं लौटेंगे. कभी नहीं लौटेंगे यह कयास का विषय है लेकिन वे अपनी बात पर कायम है. नया अध्यक्ष कौन होगा, वास्तविक अध्यक्ष होगा या 'खड़ाऊं मार्का' अध्यक्ष होगा. फिलहाल राहुल के इस्तीफे से ज़्यादा कांग्रेस को समझने की ज़रूरत है. राहुल ने इस्तीफा देकर कांग्रेस को चुनौती दी है. कांग्रेस ने वो चुनौती पिछले पांच साल तक नहीं ली. 45 दिनों से भी कोई चुनौती लेने सामने नहीं आया है. कभी जिंतेंद प्रसाद जैसे नेता थे जिन्होंने सोनिया गांधी के खिलाफ अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ा था.
कांग्रेस का यही संकट है. कई राज्य हैं जहां कांग्रेस अध्यक्ष हैं मगर कागज पर बने हुए हैं. उनके भीतर नेता बनने की न संभावना है और न बनाने की कोशिश करते हैं. सबको लगता है कि एक दिन राहुल गांधी या सोनिया गांधी चुनाव जीता देंगे और वे मंत्री बन जाएंगे. तब तक वे राजनीति में होने के नाम पर अपना और कांग्रेस का टाइम काट रहे होते हैं. आप नज़र दौड़ाइये कांग्रेस हार से पस्त कम, सुस्त ज़्यादा नज़र आती है.

कांग्रेस के सिस्टम ने भी उसके भीतर नेता बनने की संभावना सीमित कर दिया है. उसे समाप्त कर दिया है. इस वक्त कांग्रेस के बचे हुए क्षितिज पर कौन सा ऐसा नज़र आता है जिसके भीतर पार्टी को सत्ता में लाने की भूख है, जो राजनीति के बारे में सोचता है, राजनीति जीता है, जिसके पीछे उसके सहयोगी खड़े हैं. सब एक जगह से आने वाले आदेश का इंतज़ार करते हैं और उसी की आस में कांग्रेस में रहते हैं और उसी से नाराज़ होकर कांग्रेस छोड़ देते हैं. कितनी आसानी से कई नेता कांग्रेस छोड़ कर बीजेपी में चले गए. आना जाना लगा रहता है मगर एक दूसरे दल में जाने की बेचैनी बता रही है कि कांग्रेस के कार्यकर्ता और नेता के भीतर कांग्रेस नहीं है. उसकी विचारधारा बहुत कमज़ोर पड़ चुकी है. पार्टी में बचे हुए नेता पार्टी के लिए कम बीजेपी में जाने के लिए ज़्यादा बचे हुए हैं. उनके भीतर अगर कांग्रेस होती तो वे रूकते. कांग्रेस को जानते. कांग्रेस के नेताओं को जानते, पढ़ते. दरअसल कांग्रेस के भीतर कांग्रेस बनने की प्रक्रिया समाप्त हो चुकी है. कांग्रेस के आम नेता नेहरू का बचाव तक नहीं कर सके. ज़ाहिर है वे राजनीति में होते हुए राजनीति की बुनियादी किताबों से कितने दूर जा चुके हैं. राहुल गांधी का इस्तीफा कांग्रेस के लिए पारटी होने का मौका है. कांग्रेस को अब पार्टी होना होगा. जहां कोई नेता उभर सकता है, वो अपनी बातों से राजनीति की नई लकीर खींच सकता है. जो नेता हैं वो बस कांग्रेस में बने हुए है. उनके भीतर कांग्रेस कम दिखाती देती है. कांग्रेस का सपना दिखाई नहीं देता है. कांग्रेस दफ्तर के कमरे और कुरसियां दिखाई देती हैं. मूल रूप से देखें तो आज की तारीख में कांग्रेस आलसी पार्टी हो चुकी है. उसके भीतर रचनात्मका की कमी दिखाई देती है. उसके पास पारटी के तौर पर कार्यकर्ताओं और नेताओं को व्यस्त रखने के लिए राजनीतिक रूप से रचनात्मक कार्यक्रम नहीं हैं. 



दरबार में नेता बनने की जगह मैदान में नेता बनने की चुनौती आई है. कांग्रेस को देखना चाहिए कि उसके भीतर से कितने नेता दूसरे दल में चले गए और आज भी दूसरे दल में जाने के लिए बेचैन हैं. कांग्रेस को सोचना चाहिए कि उसकी पार्टी में ऐसे लोगों की भरमार क्यों है जिसमें कांग्रेस ही नहीं है. राहुल गांधी जिस आइडिया आफ इंडिया की बात करते हैं, उसकी समझ उनकी पार्टी के कितने नेताओं में हैं, कितने नेता ऐसे हैं जो उनके आइडिया आफ इडिया को पब्लिक में ले जा सकते हैं, जनता के बीच दो लाइन बोल सकते हैं. इसलिए राहुल के इस्तीफे के बाद भी कांग्रेस के नेता पीछे हट रहे हैं. शायद उन्हें अपने कांग्रेसी होने पर कम भरोसा है या फिर कांग्रेस पर कम भरोसा है. कांग्रेस पार्टी को राहुल गांधी का विकल्प नहीं खोजना है, उसे राजनीति का रास्ता खोजना है. 


 1929 का कैसा साल रहा होगा जब लाहौर के अधिवेशन में जवाहर लाल नेहरू अध्यक्ष बनते हैं तब उनकी उम्र 40 साल थी. 1947 तक कांग्रेस के 45 अध्यक्ष बन चुके थे. अपनी स्थापना यानी 1885 से लेकर 1947 के बीच 58 बार अध्यक्ष बदला. तब कांग्रेस एक जीवंत राजनीतिक पार्टी थी. 45 लोगों का अध्यक्ष बनने का मतलब है समय समय पर अलग अलग प्रतिभाओं के नेता का बनना और उभरना. हर अध्यक्ष अपनी नई सोच लेकर आया. नई प्रतिभा लेकर आया. कोई आकर फेल हुआ तो कोई आकर पास हुआ. आज वो प्रक्रिया बंद हो गई है. अगर बंद नहीं हुई होती तो कांग्रेस में राहुल का विकल्प तुरंत मिल जाता. पार्टी भले न ढूंढ पा रही हो लेकिन जनता या कार्यकर्ता को दिख जाता कि राहुल की जगह हमारा अध्यक्ष यह भी तो हो सकता है. क्या आपको कोई आवाज़ सुनाई देती है. आज 90 साल की उम्र में मोतिलाल वोरा एक महीने के लिए कार्यकारी अध्यक्ष बने हैं। 18 साल के थे जब भारत आज़ाद हुआ था. सवाल है कि क्या कांग्रेस का अध्यक्ष कोई नया होगा जो युवा भी होगा या कोई 70 साल का होगा. प्रियंका गांधी होंगी या कोई ऐसी प्रतिभा है जिसे कांग्रेस सरप्राइज़ के रूप में पेश कर सकती है. 

राहुल गांधी ने इस्तीफे में अपनी ज़िम्मेदारी स्वीकार कर ली. कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों से आग्रह किया है कि वे कुछ लोगों का ग्रुप बनाएं और नए अध्यक्ष की तलाश शुरू करें. राहुल गांधी ने लिखा है कि अध्यक्ष के नाते 2019 की हार के लिए वे ज़िम्मेदार हैं. पार्टी के भविष्य के लिए जवाबदेही ज़रूरी है. इसी कारण से कांग्रेस पद से इस्तीफा दिया है. उन्होंने लिखा है दूसरों की भी जवाबदेही तय करने की ज़रूरत है, लेकिन यह कैसे हो सकता है कि अध्यक्ष की जवाबदेही न हो. इस पत्र में राहुल ने लिखा है कि मेरा संघर्ष कबी भी राजनीतिक सत्ता के लिए साधारण लड़ाई नहीं रहा. मुझे भाजपा के प्रति कोई नफतर या गुस्सा नहीं है लेकिन मेरे शरीर में मौजूद ख़ून का एक एक क़तरा सहज रूप से भारत के प्रति बीजेपी के विचार का प्रतिरोध करती है. यह प्रतिरोध इसलिए पैदा होता है क्योंकि मेरा वजूद जिस भारत की कल्पना से बना है, उसका टकराव बीजेपी के भारत की कल्पना से है. यह कोई नई लड़ाई नहीं है. हज़ारों साल से इस धरती पर जारी है. जहां वे मतभेद देखते हैं मैं समानता देखता हूं. जहां वे नफरत देखते हैं मैं प्रेम देखता हूं. जहां वे भय देखते हैं मैं गले लगाता हूं. यह भारत का विचार है जिसकी हम रक्षा करेंगे. 

देश और संविधान पर हो रहा हमला हमारे देश के ताने-बाने को नष्ट करने के लिए हो रहा है. मैं किसी भी तरह से इस लड़ाई से पीछे नहीं हट रहा हूं. मै कांग्रेस का निष्ठावान सिपाही हूं और भारत का एक समर्पित बेटा हूं. अपनी अंतिम सांस तक उसकी सेवा और सुरक्षा करता रहूंगा.


एक राजनीतिक दल के नेता कार्यकर्ता और पूर्व अध्यक्ष होने के नाते राहुल गांधी ने अपने विचार तो लिखे हैं लेकिन क्या वाकई कांग्रेस के नेता और कांग्रेस अध्यक्ष के नाते राहुल गांधी इस विचार के लिए संघर्ष कर रहे थे. बेशक वे अपने भाषणों में प्रेम की बात कर रहे थे लेकिन क्या इतना काफी था. क्या वे उन सवालों को उस समय हो रही राजनीति का सीधा-सीधा जवाब दे रहे थे. क्या सांप्रदायिकता के सवाल को लेकर बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक मोहल्लों में जा रहे थे, सामने से नफरत की राजनीति को चुनौती दे रहे थे. कांग्रेस का कौन सा नेता था जो आइडिया आफ इंडिया के विचारों को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर जूझ रहा था, या फिर वह नरम हिन्दुत्व से कोई जुगाड़ बिठा रहा था. क्या यह सही नहीं है कि पिछले कई चुनावों में कांग्रेस की राजनीति अल्पसंख्यकों से कतरा कर चलने की हो गई थी, इस डर से की धुवीकरण न हो जाए. धुवीकरण की राजनीति के खिलाफ कांग्रेस कहां और कब संघर्ष करती नज़र आई. जो बात इस पत्र में है वो बीजेपी के खिलाफ मैदानी राजनीति में क्यों नहीं है. राहुल क्यों अकेले लड़ते रहे, और लड़े तो उस वक्त एक्शन क्यों नहीं ले रहे थे जब उनकी पार्टी के दूसरे नेता उन्हें इस लड़ाई में अकेला छोड़ रहे थे. इस पत्र में लिखा है कि कांग्रेस ने मज़बूती से और शालीनता से चुनाव लड़ा. मैंने खुद निजी रूप से प्रधानमंत्री, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उनके द्वारा कब्ज़ाए गए संस्थाओं के खिलाफ लड़ाई लड़ी. मैं लड़ा क्योंकि मैं भारत को प्यार करता हूं. कई बार मैं पूरी तरह अकेला खड़ा था और मुजे इस पर गर्व है.

एक अध्यक्ष को यह कहना पड़े कि वह अकेला लड़ता रहा तो इसका मतलब यही है कि कांग्रेस के भीतर कांग्रेस नहीं बची है. बची होती तो वह अपने अध्यक्ष के लिए लड़ती. सवाल यह भी है कि क्या उनमें लड़ने की क्षमता और नैतिक बल है. जवाब आप जानते हैं. कायदे से यह पूछा जा सकता है कि राहुल के पत्र के इस हिस्से को पढ़ने के बाद किसी कांग्रेसी नेता को शर्म आई भी या नहीं. इसके आगे उन्होंने लिखा है कि एक स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए किसी देश के संस्थानों की निष्पक्षता की आवश्यकता होती है. एक चुनाव एक स्वतंत्र प्रेस, एक स्वतंत्र न्यायपालिक और एक पारदर्शी चुनाव आयोग के बगैर नहीं हो सकता. न ही एक चुनाव स्वतंत्र हो सकता है, अगर एक पार्टी का वित्तीय संसाधनों पर पूरा एकाधिकार हो जाए. 2019 के चुनाव में हमारी लड़ाई एक राजनीतिक दल से नहीं थी. बल्कि हमने पूरी सरकारी मशीनरी से लड़ाई लड़ी, जिसका हर संस्थान विपक्ष के खिलाफ था. अब यह साफ हो गया है कि हमारी संस्थाओं की तटस्थता समाप्त हो चुकी है. 

हमारे देश की संस्थागत संरचना पर कब्ज़ा करने वाले राष्टरीय स्वंयसेवक संघ के घोषित उद्देश्य अब पूरे हो चुके हैं. एक वास्तविक ख़तरा यह है कि अब से चुनाव भारत के भविष्य को तय करने के बजाय औपचारिकता मात्र रह जाएंगे. राहुल गांधी ने लिखा है कि जीत के बाद भी प्रधानमंत्री पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप खत्म नहीं हो जाते हैं. न तो पैसा और न प्रोपेगैंडा सत्य को छिपा सकता है. भारत को एक होना होना अपनी संस्थाओं की तटस्थता को फिर से बहाल करने के लिए. कांग्रेस इसका एकता का सूत्रधार बनेगी. लेकिन इसके लिए कांग्रेस को पूरी तरह से बदलना होना. राहुल चाहते हैं कि कांग्रेस बदले, कांग्रेस चाहती है कि राहुल थोड़ा सा और बदलें.


 कांग्रेस को कांग्रेस पहले बनना होगा. फिर अध्यक्ष का मसला इतना बड़ा मसला नहीं है. जब एक पार्टी होती है तो उसमें से नेता आ ही जाता है. कांग्रेस इस वक्त पार्टी नहीं है. यह मेरी राय है. जिससे मैं सहमत हूं. तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने लोकसभा में भाषण दिया तो उसकी खूब चर्चा हुई. लेकिन बाद में खबरें आने लगीं कि उनका भाषण कहीं से चोरी किया गया था. ट्विटर से ये नौटंकी शुरू हुई और बताया जाने लगा कि महुआ मोइत्रा ने वाशिंगटन मंथली के मार्टिन लोंगमैन के लेख से अपना भाषण चुराया. इस पर टीवी एंकरों ने कार्यक्रम कर दिए. लेकिन आज मार्टिन लौंगमैन जिन्होंने वाशिंगटन मंथली में लिखा था, उन्होंने ट्विट किया है कि मैं भारत में काफी फेसम हो गया हूं क्योंकि एक राजनेता पर गलत आरोप लग रहे हैं कि उन्होंने मेरे लेख से चोरी की है. ये बेहद मज़ेदार बात है. लेकिन दक्षिणपंथी मूर्ख हर देश में एक जैसे ही होते हैं.


 कोशिश की गई कि महुआ मित्रा का भाषण जो लोकप्रिय होने लगा था उसकी साख खत्म कर दी जाए. अब आपको कोई नहीं बताएगा कि वाशिंगटन मंथली के मार्टिन ने महुआ मोइत्रा को बेदाग बताया है. इसके बाद भी मोहुआ के खिलाफ जारी रहेगा. यही पैटर्न है. उधर, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने राज्य सभा में अपने लिखित जवाब में कहा है कि नोटबंदी के बाद भ्रष्टाचार बढ़ा है. इससे किसी को घबराने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि वित्त मंत्री ने यह नहीं कहा कि भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए फिर नोटबंदी करेंगे. आप जानते हैं कि नोटबंदी के पीछे कुछ कारण बताए गए थे. यही कि नगदी का चलन बढ़ गया है, इसमें जाली नोट हैं, यह भ्रष्टाचार का पैसा है. बिहार के झंझारपुर से जदयु के सांसद रामप्रीत मंडल ने सवाल पूछा था कि नोटबंदी के कारण भ्रष्टाचार कम हुआ है या नहीं. नवंबर 2016 से नगदी के चलन में वृद्धि हुई है. 4 नवंबर 2016 की स्थिति के अनुसारा नोटों का कुल मूल्य 17,741 बिलियन रुपये था. 29 मार्च 2019 के अनुसार परिचालन करेंसी का मूल्य 21, 137.64 बिलियन रुपए था. आर्थिक समीक्षा 2016-17 में लिखा है कि दुनिया भर में नकदी और गलत कार्यकलापों के बीच गहरा रिश्ता पाया जाता है.

ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल के आंकलन के अनुसार चलन में नकदी जितनी अधिक होगी, भ्रष्टाचार उतना अधिक होगा. वित्त मंत्री ने जिस ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट का ज़िक्र किया है उसके अनुसार 2017 और 2018 के बीच भारत में रिश्वतखोरी 11 प्रतिशत बढ़ गई थी. वैसे प्रधानमंत्री ने दावा किया था कि भ्रष्टाचार खत्म हो गया है. वैसे लोकसभा के लिखित जवाब में वित्त मंत्रालय का बिलयन रुपये लिखना अजीब लगता है. अजीबों ग़रीब की जगह अजीबों अमीर लगता है. अरब रुपये भी लिखा जा सकता था. क्या वहां हिन्दी लिखने वाले को समय से सैलरी नहीं मिलती है. वैसे सुप्रीम कोर्ट के फैसले अंग्रेज़ी के अलावा हिन्दी, असमिया, तेलगु, मराठी, कन्नड और ओड़िया में आएंगे. माननीय अदालत से अपील है कि फैसले का अनुवाद इस तरह से न किया जाए कि हिन्दी में फैसला पढ़ने के बाद अंग्रेज़ी से मिलाना पड़े. भारतीय भाषाओं में फैसले उपलब्ध कराने का मकसद यह होना चाहिए कि आम लोग उसे पढ़ें और समझ भी सकें. सरकार के शब्दकोश की हिन्दी अंग्रेज़ी से भी मुश्किल होती है. 


महाराष्ट्र के रत्नागिरी में बांध टूट जाने से 12 लोगों की मौत हो गई. दर्जनभर मकान पानी में बहे. तिवारे बांध की एक दीवार मंगलवार की रात टूट गई. अभी भी कई लोग लापता है. पिछले साल ही इस बांध की मज़बूती को लेकर सवाल उठे थे. मई महीने में मरम्मत भी कराई गई थी लेकिन अब इसकी जांच होगी. जिन 12 लोगों की मौत हुई वो किसकी लापरवाही के कारण हुई. हमारे सहयोगी सुनिल सिंह ने बताया है कि हादसे के बाद समझ आया है कि सभी बांधों की ऑडिट की जानी चाहिए. हादसे से पहले अगर यह काम हुआ होता तो 12 लोगों की जान नहीं जाती. हमने इस घटना के बारे में कई मीडिया न्यूज़ साइट पर जाकर देखा कि क्या कोई अतिरिक्त जानकारी मिल सकती है. जो मारे गए हैं उनकी संख्या मिली मगर उनकी कोई और जानकारी नहीं. 

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उधर, चैन्नई में सूखा अलग तरह का संकट लेकर आने लगा है. बिजनेस स्टैंडर्ड में एक रिपोर्च है. चेन्नई से 32 मील दूर एक गांव के लोगों ने एक टैंकर को कब्ज़े में ले लिया. उनका आरोप है कि गांव का पानी शहरों को दिया जा रहा है. एक ग्रामीण ने सरकार को पत्र लिखा है कि प्राइवेट टैंकर वालों ने उनके गांव में 8 से ज़्यादा बोरवेल लगा दिए हैं. वहां से पानी निकला कर चेन्नई के होटलों में पहुंचाया जा रहा है. गांव का पानी कम होने लगा है. रात दिन पानी निकालने के कारण उनके गांव का एक जलाशय सूख गए हैं. हिन्दू अखबार ने लिखा है कि जल्दी ही डे ज़ीरो आने वाला है. सारे जलाशयों के सूख जाने की आशंका गहरी हो गई है. पानी खत्म होते ही चेन्नई में डे ज़ीरो घोषित हो जाता है. आइडिया केपटाउन से आया है. जहां पानी की राशनिंग की गई थी. नल में पानी नहीं आएगा. सरकार पानी के लिए सार्वजनिक तय करेगी और वहां से सबको निश्चित मात्रा में पानी लाना होगा. इसी तरह से यूपी के पश्चिमी इलाके में भयंकर सूखा है. पांच साल में जून इतना सूखा कभी नहीं गया.


राज्य सभा में आज चुनाव सुधारों पर बहस हुई. विपक्ष ने चुनावों में पैसे के इस्तमाल और मीडिया की भूमिका पर भी सवाल उठाए. नमो टीवी की भूमिका की चर्चा आई. चुनाव आयोग की भूमिका पर भी सवाल उठे. कई सांसदों ने कहा कि चंदे के मामले में यह चुनाव एकतरफा हो गया था. तमिलनाडु से सीपीएम के राज्य सभा सांसद टी के रंगराजन ने कहा कि उनकी पारटी को कारपोरेट चंदा भी नहीं देते हैं. चुनाव में कोरपोरेट फंड बंद होना चाहिए. डेरेक ओ ब्रायन ने कहा कि चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की प्रक्रिया पर फिर से विचार करने की ज़रूरत है. विपक्ष के कई दलों ने मिल कर चुनाव सुधारों पर बहस की मांग की थी. 
 



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