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होलाष्टक 5 मार्च से, जानिए क्यों नहीं करना चाहिए इस अवधि में शुभ काम

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होलाष्टक 5 मार्च से, जानिए क्यों नहीं करना चाहिए इस अवधि में शुभ काम
होलाष्टक का संधि-विच्छेद होता है होली और अष्टक. इसका तात्पर्य होली के आठ दिन से है. हिन्दू पंचांग के अनुसार, इसकी शुरुआत होलिका दहन के सात दिन पहले और होली के त्यौहार के दिन के आठ दिन पहले होती है. पारंपरिक रूप से इसका समापन  धुलेंडी के दिन हो जाता है. चूंकि इसकी शुरुआत फाल्गुन शुक्ल पक्ष अष्टमी से होती और यह सीधे तौर पर होली से संबंधित है, इसलिए इसे होलाष्टक कहते हैं. वास्तव में होलाष्टक, होली के आगमन का पूर्व-सूचक है और इसका होलिका दहन से घनिष्ठ संबंध है, क्योंकि इसी दिन से होलिका दहन की विधिवत तैयारियां शुरू हो जाती है.  
रंग और उल्लास के पर्व होली से संबंधित होने के बावजूद होलाष्टक की अवधि यानी इसके आठ दिन शुभ नहीं माने गए है. इस दौरान हिन्दू धर्म के 16 संस्कारों में से किसी भी संस्कार को संपन्न करने की मनाही है. यह निषेध अवधि होलाष्टक के दिन से लेकर होलिका दहन के दिन तक रहती है. होलाष्टक मुख्य उत्तरी भारत में मनाया जाता है. दक्षिण भारत और कुछ अन्य स्थानों पर होलाष्टक नहीं मानते हैं, लिहाजा वहां ऐसा कोई निषेध नहीं है.  
प्रचलित रिवाज के अनुसार होलाष्टक के पहले दिन होलिका दहन के लिए 2 डंडे स्थापित किये जाते हैं, जिसमें से एक को होलिका और दूसरे को प्रह्लाद माना जाता है. हिन्दू धर्म की शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार जिस क्षेत्र में होलिका दहन के लिए ये डंडे स्थापित किये जाते हैं, उस क्षेत्र में होलिका दहन तक कोई भी शुभ कार्य करना वर्जित है. क्योंकि, सनातन धर्म होलिका दहन को दाहकर्म और मृत्यु का सूचक माना गया है.
गौरतलब है कि इस साल होलाष्टक 5 मार्च से शुरू होकर 12 मार्च तक रहेगा. इन आठ दिनों में क्रमश: अष्टमी तिथि को चंद्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्र, द्वादशी को वृहस्पति, त्रयोदशी को बुध और चतुर्दशी को मंगल और पूर्णिमा को राहु ग्रह उग्र रूप लिए माने जाते हैं, जिनसे अनिष्ट होने की संभावना रहती है. इसलिए इस अवधी में शुभ काम की शुरुआत है. होली का त्यौहार 13 मार्च को मनाया जायेगा.

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