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समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ आखिर वही हुआ जिसका मार्च में लगाया गया था अंदाजा

हालांकि काफी हद तक मुलायम सिंह यादव के परिवार के सदस्यों का आपसी टकराव भी इस मौजूदा स्थिति के लिए जिम्मेदार है. उन्होंने कहा, "शिवपाल का असर यादव बेल्ट में खासा पड़ा. मैनपुरी, इटावा, फिरोजाबाद जैसे गढ़ से सपा को नुकसान उठाना पड़ा. शिवपाल की सपा कार्यकर्ताओं के बीच अच्छी पैठ है. इसका खमियाजा सपा को इस चुनाव में उठाना पड़ा.

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समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ आखिर वही हुआ जिसका मार्च में लगाया गया था अंदाजा

लोकसभा चुनाव में बीएसपी को 10 और सपा को मात्र 5 सीटें आई हैं. (फाइल फोटो)

खास बातें

  1. सीट बंटवारे में गच्छा खा गए अखिलेश?
  2. राम गोपाल यादव ने भी उठाए सवाल
  3. ऐसी सीटें मिलीं जहां नहीं था कोई आधार
नई दिल्ली:

लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में सपा और बीएसपी के बीच सीटों का जिस तरह से बंटवारा  हुआ था उसे देखकर ऐसा लग गया था अखिलेश यादव मायावती की चतुराई समझ नहीं पाए हैं. एनडीटीवी ने 4 मार्च 2019 को ही सीटों का विश्लेषण कर अंदाजा लगाया गया था कि सपा की क्या हालत हो सकती है. रिपोर्ट में कहा गया था कि बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने सीटों के बंटवारे में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव से बाजी मार ली है. शायद इस हालात को सपा के सबसे वरिष्ठ नेता मुलायम सिंह यादव भांप गए थे. यही वजह है कि उन्होंने टिकटों के गलत बंटवारे की बात कही थी. दरअसल सपा के खाते में कई सीटें ऐसी आई थीं जहां पर उसका प्रदर्शन पहले बहुत ही खराब था और सीट बंटवारे में मायावती ने वो सारी सीटें ले लीं, जहां जातीय गणित के लिहाज से जीत का भरोसा था. सपा को ऐसी कई सारी सीटें दे दी गईं, जहां सपा-बसपा का संयुक्त वोट किसी उम्मीदवार को जिताने लायक नहीं था. वाराणसी, लखनऊ, कानपुर और गाजियाबाद ऐसी ही सीटें थीं. इन सीटों पर पहले ही माना जा रहा था कि गठबंधन प्रत्याशी नहीं जीत पाएगा. मायावती ने मन मुताबिक सीटें ले लीं. वोटों के अदान-प्रदान के लहजे से देखें तो जिन 10 सीटों पर बसपा ने जीत दर्ज की है, वहां सपा 2014 में दूसरे स्थान पर थी. इसी कारण सपा को असफलता मिली. नगीना, बिजनौर, श्रावस्ती, गाजीपुर सीटों पर सपा के पक्ष में समीकरण थे. दूसरा कारण गठबंधन की केमेस्ट्री जमीन तक नहीं पहुंची. सभाओं में भीड़ देखकर इन्हें लगा कि हमारे वोट एक-दूसरे को ट्रान्सफर हो जाएंगे. लेकिन ऐसा हुआ नहीं."

4 मार्च 2019 की रिपोर्ट : सीटों के बंटवारे पर क्या मायावती की 'चतुराई' को समझ नहीं सके अखिलेश यादव


हालांकि काफी हद तक मुलायम सिंह यादव के परिवार के सदस्यों का आपसी टकराव भी इस मौजूदा स्थिति के लिए जिम्मेदार है. उन्होंने कहा, "शिवपाल का असर यादव बेल्ट में खासा पड़ा. मैनपुरी, इटावा, फिरोजाबाद जैसे गढ़ से सपा को नुकसान उठाना पड़ा. शिवपाल की सपा कार्यकर्ताओं के बीच अच्छी पैठ है. इसका खमियाजा सपा को इस चुनाव में उठाना पड़ा." उल्लेखनीय है कि प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) बनाकर शिवपाल अपने भतीजे अक्षय यादव के मुकाबले खुद मैदान में आ गए, और अक्षय अपने भाजपा प्रतिद्वंद्वी से 28,781 वोटों से हार गए. यहां शिवपाल को 91,651 वोट हासिल हुए. माना जा रहा है कि शिवपाल मैदान में न होते तो अक्षय चुनाव जीत जाते.

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इसके अलावा अन्य कई सीटों पर भी उन्होंने सपा के ही वोट काटे. शिवपाल की विधानसभा सीट जसवंतनगर क्षेत्र से भी सपा को नुकसान हुआ है. 2017 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया था, उस समय भी हार का सामना करना पड़ा था. अब लोकसभा चुनाव में भी गठबंधन काम नहीं आया.  यहीं पर, मायावती को यह मालूम था कि मुस्लिम वोटरों पर मुलायम की वजह से सपा की अच्छी पकड़ है. इसका फायदा मायावती को हुआ. मायावती ने जीतने वाली सीटें अपने खाते में ले ली.  

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कई सीटों पर बसपा उम्मीदवार बहुत मामूली अंतर से हार गए. इसमें मेरठ और मछली शहर शामिल हैं. मछली शहर में मो. बसपा उम्मीदवार टी. राम अपने भाजपा प्रतिद्वंद्वी बी.पी. सरोस से मात्र 181 मतों से हार गए. सपा और बसपा के नेताओं ने भले ही समझौता कर लिया हो लेकिन जमीन पर दोनों के कॉडर एक दूसरे से मिल नहीं पाए. आधी सीटें दूसरे दल को देने से उस क्षेत्र विशेष में उस दल के जिला या ब्लाक स्तरीय नेताओं को अपना भविष्य अंधकारमय दिखने लगा. इन सबका परिणाम यह हुआ कि सपा का वोट प्रतिशत 2014 के लोकसभा चुनाव के 22.35 प्रतिशत से घटकर इस बार 17.96 फीसदी रह गया. वोट प्रतिशत बसपा का भी घटा, लेकिन उसके वोट सीटों में बदल गए. 2014 के आम चुनाव में बसपा को 19.77 प्रतिशत मत मिले थे, जो इस बार घटकर 19.26 फीसदी रह गए.

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इनपुट : आईएनएस से भी



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