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अटल बिहारी वाजपेयी कैसे आये थे RSS में, जानें पूरा किस्सा

अटल बिहारी वाजपेयी के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी RSS से जुड़ने का किस्सा भी दिलचस्प है. उन दिनों आर्य समाज के यूथ विंग आर्य कुमार सभा का बोलबाला था, जिसका उद्देश्य युवाओं का चरित्र निर्माण का था.

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अटल बिहारी वाजपेयी कैसे आये थे RSS में, जानें पूरा किस्सा

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी (फाइल फोटो)

नई दिल्‍ली:

अटल बिहारी वाजपेयी (Atal Bihari Vajpayee) उन चुनिंदा नेताओं में शुमार हैं जिनकी स्वीकार्यता सभी सियासी दलों में है. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि अटल जी राजनीति में शुचिता और पारदर्शिता के समर्थक थे. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से बतौर स्वयंसेवक शुरुआत कर प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने के बावजूद आमजन से उनका जुड़ाव बना रहा.

अटल बिहारी वाजपेयी के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी RSS से जुड़ने का किस्सा भी दिलचस्प है. उन दिनों आर्य समाज के यूथ विंग आर्य कुमार सभा का बोलबाला था, जिसका उद्देश्य युवाओं का चरित्र निर्माण का था. देश के तमाम गांव-कस्बों में आर्य कुमार सभा की सप्ताहिक बैठकें हुआ करती थीं. नौजवान इन बैठकों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे. यह साल 1939 था. किशोर अटल बिहारी वाजपेयी ग्वालियर में एक रविवार अपने दोस्तों के साथ आर्य कुमार सभा की साप्ताहिक बैठक में हिस्सा लेने पहुंचे.

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बैठक शुरू हुई और 15 वर्षीय अटल बिहारी वाजपेयी ने चंद मिनटों में ही सभा के वरिष्ठ कार्यकर्ता भूदेव शास्त्री का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया. अटल जी की वाकपटुता से वे मंत्रमुग्ध हो गए और उसी समय उन्होंने मन में ठान लिया कि यह लड़का तो संघ में होना चाहिए. बैठक खत्म हुई और भूदेव शास्त्री खुद अटल जी के पास गए. उन्होंने पूछा, 'तुम शाम में क्या करते हो? अटल जी ने कहा, कुछ खास नहीं'. भूदेव शास्त्री ने कहा, फिर क्यों नहीं शाम को तुम संघ की शाखा में आते हो!

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किंगशुक नाग अपनी किताब ''अटल बिहारी वाजपेयी : ए मैन फॉर ऑल सीजन्स" में इस घटना का ज़िक्र करते हुए लिखते हैं कि, अटल जी पहले से ही भूदेव शास्त्री कि सांगठनिक क्षमता आदि से काफी प्रभावित थे. जब भूदेव शास्त्री ने उनके सामने यह प्रस्ताव रखा तो उन्होंने हां कहने में तनिक भी देर नहीं लगाई. उस दिन उन्होंने भी नहीं सोचा था कि यह फैसला उनकी जिंदगी को बदलने वाला है और एक ऐसे रास्ते पर ले जाने वाला है जिसकी मंजिल प्रधानमंत्री की कुर्सी थी.

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