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शिवसेना की कांग्रेस से 'दोस्ती' BJP से भी पुरानी, क्या महाराष्ट्र में खिलने वाला है 'नया गुल'?

महाराष्ट्र में शिवसेना नेता संजय राउत और एनसीपी प्रमुख शरद पवार से हुई मुलाकात के बाद दिल्ली तक हलचल बढ़ गई है. बीजेपी से 50-50 के फॉर्मूले पर अड़ी शिवसेना उस समय नरम पड़ती दिखाई पड़ी जब विधायक दल की बैठक में एकनाथ शिंदे को विधायक दल का नेता चुना गया.

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शिवसेना की कांग्रेस से 'दोस्ती' BJP से भी पुरानी, क्या महाराष्ट्र में खिलने वाला है 'नया गुल'?

खास बातें

  1. क्या कांग्रेस का समर्थन लेगी शिवसेना
  2. पहले भी कई मुद्दों पर रहे हैं साथ
  3. NCP प्रमुख से मिले संजय राउत
नई दिल्ली:

महाराष्ट्र में शिवसेना नेता संजय राउत और एनसीपी प्रमुख शरद पवार से हुई मुलाकात के बाद दिल्ली तक हलचल बढ़ गई है. बीजेपी से 50-50 के फॉर्मूले पर अड़ी शिवसेना उस समय नरम पड़ती दिखाई पड़ी जब विधायक दल की बैठक में एकनाथ शिंदे को विधायक दल का नेता चुना गया. क्योंकि उद्धव ठाकरे पहले भी तय कर चुके हैं कि शिवसेना की ओर से मुख्यमंत्री आदित्य ठाकरे ही होंगे. लेकिन संजय राउत की शरद पवार से मुलाकात के बाद शिवसेना का रुख और सख्त हो गया है. आज सुबह संजय राउत ने कहा कि महाराष्ट्र में बीजेपी के साथ सरकार बनाने को लेकर कोई बातचीत नहीं हो रही है और इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि महाराष्ट्र में अगला मुख्यमंत्री शिवसेना की होगा.  तो क्या शिवसेना एनसीपी के समर्थन से सरकार बनाने को तैयार है? लेकिन इसके लिए क्या शिवसेना को कांग्रेस का भी समर्थन लेने को राजी हो जाएगी? इसके लिए हमें बीते राजनीतिक घटनाक्रमों पर भी नजर डालनी पड़ेगी. कांग्रेस और शिवसेना में भले ही गहरे वैचारिक मतभेद रहे हों लेकिन मौका पड़ने पर दोनों दल एक साथ आ चुके हैं. 

कब किया शिवसेना ने कांग्रेस का समर्थन
साल 2007 में हुए राष्ट्रपति चुनाव में शिवसेना ने कांग्रेस की प्रत्याशी प्रतिभा पाटिल का समर्थन किया था. इसके बाद साल 2012 के राष्ट्रपति चुनाव कांग्रेस के प्रत्याशी प्रणब मुखर्जी को भी शिवसेना का समर्थन मिला. साल 2018 में शिवसेना के मुखपत्र सामना में संजय राउत ने लिखा कि सिर्फ 'आपातकाल' के फैसले के लेकर इंदिरा गांधी के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है. राउत आगे लिखा कि इंदिरा गांधी ने लोकतंत्र समर्थक थीं और आपातकाल के बाद उन्होंने चुनाव भी कराए और हार गईं. इससे पहले आपातकाल के तुरंत बाद 1977 में हुए लोकसभा चुनाव के दौरान बाला साहेब ठाकरे और उनका संगठन शिवसेना इंदिरा गांधी की अगुवाई वाले कांग्रेस के समर्थन में रहे. इसके बाद 1980 के चुनाव में भी उन्होंने कांग्रेस का ही साथ दिया. इन दोनों लोकसभा चुनाव में शिवसेना खुद चुनाव में उतरी ही नहीं थी. 


हालांकि राम मंदिर आंदोलन के पहले तक शिवसेना के एजेंडे में हिंदुत्व नहीं था और देखने वाली बात यह होगी कि लोकसभा चुनाव 2019 के पहले तक अयोध्या का राग अलापते रहे उद्धव ठाकरे क्या बीजेपी का साथ छोड़कर कांग्रेस का समर्थन लेंगे. हालांकि इस बार मामला मुद्दों का नहीं, सरकार बनाने का है.

शिवसेना का ही मुख्यमंत्री होगा: संजय राउत

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