लॉकडाउन: प्रवासी मजदूरों को घर वापस भेजने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई बंद की

प्रवासी मजदूरों को घर वापस भेजने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई बंद कर दी है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में केंद्र और राज्य सरकारें जरूरी कदम उठा रही हैं. इसलिए इस याचिका को लंबित नहीं रखा जा सकता.

लॉकडाउन: प्रवासी मजदूरों को घर वापस भेजने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई बंद की

प्रवासी मजदूरों को घर वापस भेजने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई बंद कर दी है.

नई दिल्ली:

प्रवासी मजदूरों को घर वापस भेजने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई बंद कर दी है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में केंद्र और राज्य सरकारें जरूरी कदम उठा रही हैं. इसलिए इस याचिका को लंबित नहीं रखा जा सकता. वहीं केंद्र सरकार की ओर से तुषार मेहता ने कहा कि सरकार प्रवासी मजदूरों के लिए कदम उठा रही है और देशभर में राज्यों के सहयोग से ट्रेन व बसों के माध्यम से उन्हें गांव पहुंचाने की व्यवस्था की जा रही है. तुषार मेहता ने कहा कि उन्हें इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि रेलवे का 85 फीसदी खर्च केंद्र उठा रहा है.

वहीं याचिकाकर्ता की ओर से प्रशांत भूषण ने कहा कि सभी को घर नहीं पहुंचाया जा रहा है.  इसके साथ ही मजदूरों से 700-800 रुपये किराया वसूला जा रहा है. साथ ही उनसे कहा जा रहा है कि वो अस्पताल से सर्टिफिकेट लाएं. प्रशांत भूषण ने कहा कि सरकार को उनके ले जाने के लिए निशुल्क व्यवस्था करना चाहिए.

पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने शहरों से घर वापस जाने के इच्छुक प्रवासी मज़दूरों की सुरक्षित यात्रा की व्यवस्था के संबंध में केंद्र से अपना जवाब दाखिल करने को कहा था. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कहा है कि यदि इस विषय में कोई प्रस्ताव हो तो अदालत के सामने पेश किया जाए.

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने एक हफ्ते के अंदर केंद्र से जवाब मांगा था कि क्या प्रवासी मजदूरों को उनके गांवों में जाने की अनुमति दी जा सकती है? सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पूछा था कि कैसे जानकारी को सत्यापित किया जाएगा कि प्रवासी मजदूरों की आवाजाही नहीं बंद हुई है.

इस पर याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि कुछ राज्य सरकारों का कहना है कि वे लोगों को उनके मूल गांवों में वापस भेज देंगे, लेकिन गृह मंत्रालय की ओर से किसी भी आवाजाही की अनुमति नहीं है. याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश प्रशांत भूषण ने प्रवासी श्रमिकों की दुर्दशा पर प्रकाश डाला और तर्क दिया कि सरकार उनके हितों की रक्षा के लिए बहुत कुछ नहीं कर रही है.

देशभर में प्रभावित हो रहे लाखों प्रवासी मज़दूरों के इस मुद्दे पर अदालत से हस्तक्षेप करने का आग्रह करते हुए भूषण ने जोर देकर कहा कि  संविधान द्वारा बनाई गई संस्था होने के नाते सुप्रीम कोर्ट को नागरिकों के इस वर्ग की रक्षा करनी चाहिए. वहीं सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार वास्तव में प्रत्येक नागरिक के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए अपने स्तर पर अच्छा कर रही है और इस मुद्दे से निपटने के लिए केंद्र और राज्य दोनों सरकारें विचार-विमर्श में लगी हुई हैं.

सॉलिसिटर जनरल मेहता ने यह भी कहा कि वास्तव में श्रमिकों को अपनी मूल भूमि पर वापस जाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि जहां भी वे होंगे, वहां उनके परिवार के साथ उनकी दैनिक जरूरतों का ध्यान रखा जाएगा.

सॉलिसिटर जनरल ने आगे पीठ को आश्वासन दिया कि सरकार इस संबंध में आवश्यक कदम उठा रही है और यह भी कहा कि शहरों से गांवों में प्रवासियों का जाना "निवारक उपायों के उद्देश्य को नष्ट कर देगा क्योंकि इससे ग्रामीण क्षेत्रों के संक्रमित होने की आशंका है.

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) के पूर्व प्रोफेसर और संस्थापक ट्रस्टी जगदीप एस छोकर और वकील गौरव जैन की उस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने  सुनवाई की जिसमें कोरोना नेगेटिव मजदूरों को उनको अपने घरों की तरफ जाने की इजाजत मांगी गई है.  

याचिका में कहा गया है कि उन प्रवासी मजदूरों को घर जाने की इजाजत दी जाए, जिनका कोरोना टेस्ट निगेटिव आया है. साथ ही यह मांग भी की गई थी कि राज्य सरकारों को इन लोगों को घर, गांव तक जाने की पूरी व्यवस्था करनी चाहिए.

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