कोविड के इलाज में प्लाज्मा थेरेपी का अंत नहीं हुआ, अभी इस पर बहुत काम बाकी : डॉ एसके सरीन

कोरोना वायरस मरीजों पर प्लाज्मा थेरेपी के असर पर आईसीएमआर की स्टडी को लेकर आईएलबीएस हॉस्पिटल के डायरेक्टर डॉ एकके सरीन ने कहा इस अभी बहुत सारे एंगल से देखना जरूरी

कोविड के इलाज में प्लाज्मा थेरेपी का अंत नहीं हुआ, अभी इस पर बहुत काम बाकी : डॉ एसके सरीन

प्रतीकात्मक फोटो.

नई दिल्ली:

आईएलबीएस हॉस्पिटल के डायरेक्टर डॉ एकके सरीन (Dr SK Sarin) ने कोरोना वायरस मरीजों (Coronavirus) पर प्लाज्मा थेरेपी (Plasma therapy) के असर पर आईसीएमआर (ICMR) की स्टडी को लेकर कहा है कि ''यह स्टडी यह नहीं कहती है कि आप अपना रास्ता बंद कर लें. यह स्टडी कहती है कि 'इतना सा फायदा है' लेकिन ऐसा कोई नुकसान नहीं है. साइंस की एक खूबसूरती होती है कि सभी जवाब एक ट्रायल में नहीं मिलेंगे, इसके लिए आप अगली रिसर्च शुरू करते हैं. प्लाज्मा थेरेपी पर अभी बहुत काम बाकी है अभी बहुत से एंगल से इसको देखना जरूरी है. मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि प्लाज्मा थेरेपी का यह अंत नहीं है. अमेरिका में 65000 लोगों को प्लाज्मा दिया गया है और अभी भी चल रहा है. अगर इतने एडवांस और समझदार देश (अमेरिका) में प्लाज्मा थेरेपी दी जा रही है तो लोगों को कुछ तो फायदा हो रहा होगा?''

उन्होंने कहा कि ''अचानक हम प्लाजमा थेरेपी को रोकें इसके पीछे कोई तर्क नहीं है क्योंकि खुद आईसीएमआर की स्टडी कह रही है कि सांस फूलना कम हुआ, ऑक्सीजन की जरूरत कम हुई, थकान कम हुई, वायरस कम हो गया.... तो हमें इस स्टडी के अच्छे पहलू भी देखने चाहिए और फिलहाल किसी और चीज से यह संभव नहीं है.''

देश में प्लाज्मा थेरेपी का सबसे पहला ट्रायल दिल्ली में डॉ एसके सरीन के सुपरविजन में शुरू हुआ. देश का पहला प्लाज्मा बैंक दिल्ली में डॉ एस के सरीन के हॉस्पिटल आईएलबीएस में शुरू हुआ. ILBS के डायरेक्टर डॉ एसके सरीन ने आज NDTV से कहा कि ''हम सब आईसीएमआर की स्टडी का इंतजार कर रहे थे क्योंकि यह एक बहुत ही सम्मानित संस्थान है. आईसीएमआर की बहुत ही अच्छी प्लानिंग वाली स्टडी है जो 39 अस्पतालों में 464 लोगों के ऊपर की गई. मेरे हिसाब से यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण मील का पत्थर है. इस स्टडी ने यह जरूर बताया कि प्लाज्मा थेरेपी मौत को रोकने में कारगर नहीं है.''

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उन्होंने कहा कि ''दो तीन चीजें इस स्टडी में हैं जो प्लाज़्मा के फायदे बताती हैं. जिन लोगों को प्लाज्मा मिला उनका सांस फूलना कम हुआ, 3 से 5 दिन उनको ऑक्सीजन की कम ज़रूरत पड़ी. जिनको प्लाज्मा मिला, उनमें थकान कम हुई और जिनको प्लाज्मा मिला उनका वायरस ज्यादा तादाद में और जल्दी निगेटिव हुआ.''

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डॉ सरीन ने कहा कि ''हमने भी शुरू में 29 मरीजों पर स्टडी की थी और यह बिल्कुल हमारी स्टडी जैसी है. हमने कभी अपनी स्टडी में यह नहीं कहा कि प्लाज्मा देने से लोग ज्यादा जीते हैं. हमने कहा था कि प्लाज्मा के कुछ फायदे हैं. एलएनजेपी और आईएलबीएस की जो साझा स्टडी थी उसमें गंभीर मरीजों को प्लाज्मा दिया गया था जबकि आईसीएमआर की स्टडी में मॉडरेट मरीजों को प्लाज्मा दिया गया. हमारी स्टडी और आईसीएमआर की स्टडी यह बताती है कि ऑक्सीजन की जरूरत कम हो गई, सांस फूलने की समस्या में सुधार हुआ,आपका वायरस निगेटिव हो गया और थकान या कमजोरी कम हो गई. हालांकि अमेरिका में FDA ने यह कहा है कि प्लाज्मा थेरेपी 35 फ़ीसदी तक मौत कम कर सकती है.''