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वह प्रधानमंत्री, जिसका शव आधे घंटे बाहर रखा रहा, लेकिन नहीं खुला पार्टी मुख्यालय का दरवाजा

सोनिया गांधी के आवास से सटे 24 अकबर रोड के पास  तोप गाड़ी की रफ्तार थोड़ी धीमी हो गई. पार्टी मुख्यालय का गेट बंद था.

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वह प्रधानमंत्री, जिसका शव आधे घंटे बाहर रखा रहा, लेकिन नहीं खुला पार्टी मुख्यालय का दरवाजा

नरसिम्हा राव का शव करीब आधे घंटे कांग्रेस मुख्यालय के बाहर रखा रहा, लेकिन गेट नहीं खुला.

नई दिल्ली : 23 दिसंबर 2004. पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने करीब 11 बजे एम्स में आखिरी सांस ली थी. करीब ढाई बजे उनका शव एम्स से उनके आवास 9 मोती लाल नेहरू मार्ग लाया गया. उस वक्त चर्चित आध्यात्मिक गुरु चंद्रास्वामी, राव के 8 बेटे-बेटियां, भतीजे और परिवार के अन्य लोग घर पर मौजूद थे. राव का शव एम्स से घर पहुंचने के बाद असल राजनीति शुरू हुई. तत्कालीन गृह मंत्री शिवराज पाटिल ने राव के छोटे बेटे प्रभाकरा को सुझाव दिया कि अंतिम संस्कार हैदराबाद में किया जाए. इसके पीछे वजह भी थी. पीवी नरसिम्हा राव पीएम बनने से पहले आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रह चुके थे. हालांकि परिवार दिल्ली में ही अंतिम संस्कार पर अड़ा था. 

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थोड़ी देर बाद कांग्रेस की तत्कालीन अध्यक्ष सोनिया गांधी के एक और करीब गुलाब नबी आजाद  9 मोती लाल नेहरू मार्ग पहुंचे. उन्होंने भी राव के परिवार से शव को हैदराबाद ले जाने की अपील की. इसी बीच राव के बेटे प्रभाकरा का फोन बजा. दूसरी तरफ आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता वाईएस राजशेखर रेड्डी थे. उन्होंने संवेदनाएं व्यक्त की और कहा कि मैं दिल्ली पहुंचने वाला हूं. हम शव को हैदराबाद लाएंगे और यहां पूरे सम्मान के साथ अंतिम संस्कार करेंगे. शाम को 6.30 बजे सोनिया गांधी  9 मोती लाल नेहरू मार्ग में दाखिल हुईं. उनके साथ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कद्दावर नेता प्रणब मुखर्जी भी थे. कुछ सेकेंड मौन के बाद मनमोहन सिंह ने प्रभाकरा से पूछा, 'आप लोगों ने क्या सोचा है? ये लोग कह रहे हैं कि अंतिम संस्कार हैदराबाद में होना चाहिए'. प्रभाकरा ने कहा, 'यह (दिल्ली) उनकी कर्मभूमि थी. आप अपने कैबिनेट सहयोगियों को यहां अंतिम संस्कार के लिए मनाइये. 

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मनमोहन सिंह के बगल में खड़ी सोनिया गांधी कुछ बुदबुदाईं. तब तक वाईएस राजशेखर रेड्डी भी पहुंच चुके थे. वह परिवार को मनाने में जुट गए. रेड्डी ने कहा, 'आंध्र प्रदेश में हमारी सरकार है. भरोसा करिये, पूरे सम्मान के साथ अंतिम संस्कार होगा. साथ ही भव्य मेमोरियल भी बनाएंगे. राव की बेटी एस. वाणी देवी कहती हैं कि शव को हैदराबाद ले जाने के लिए परिवार को मनाने में रेड्डी की मुख्य भूमिका थी. खैर, तमाम बातचीत के बाद परिवार थोड़ा नरम पड़ा, लेकिन सरकार से उम्मीद थी कि वह दिल्ली में पीवी नरसिम्हा राव का मेमोरियल बनवाने का भरोसा दे. वहां मौजूद कांग्रेस नेताओं ने तत्काल इसकी हामी भर दी, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में पार्टी का राव के प्रति जो व्यवहार था उससे परिवार को शक होना लाजिमी था. करीब 9.30 बजे वे उस शख्स के पास पहुंचे जो राव के साथ उनके अंतिम दिनों तक खड़ा था. शिवराज पाटिल ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को राव के परिवार की डिमांड के बारे में बताया. उन्होंने झट से कहा, 'कोई दिक्कत नहीं है. हम इसे पूरा कर देंगे'. 

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अगले दिन यानी 24 दिसंबर को तिरंगे में लिपटी राव की बॉडी को एक तोप गाड़ी (गन कैरिज) में रखा गया. इस गाड़ी के साथ सेना के जवान भी थे. एयरपोर्ट के रास्ते में वह पता भी पड़ता था जो पीवी नरसिम्हा राव सियासी पारी का करीबन केंद्र बिंदु हुआ करता था. राव यहां सैकड़ों बार गए थे. यह पता था 24 अकबर रोड यानी कांग्रेस के मुख्यालय का. परिवार ने तय किया कि एयरपोर्ट जाने से पहले उनके शव को कुछ समय के लिए पार्टी मुख्यालय में रखा जाए. सोनिया गांधी के आवास से सटे 24 अकबर रोड के पास  तोप गाड़ी की रफ्तार थोड़ी धीमी हो गई. पार्टी मुख्यालय का गेट बंद था. वहां कांग्रेस के तमाम नेता मौजूद थे, लेकिन सब चुप्पी साधे हुए थे. हां...सोनिया गांधी और अन्य नेता अंतिम विदाई देने के लिए जरूर बाहर आए. चूंकि किसी भी नेता के निधन के बाद उसका शव पार्टी मुख्यालय में आम कार्यकर्ताओं के दर्शन के लिए रखने का रिवाज था. ऐसे में राव के परिजनों को इस बात की उम्मीद भी नहीं थी कि ऐसा भी हो सकता है. 

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करीब आधे घंटे तक शव को ले जा रही तोप गाड़ी बाहर खड़ी रही और फिर यह एयरपोर्ट के लिए रवाना हो गई. विनय सीतापति अपनी किताब 'द हाफ लायन' में लिखते हैं कि जब राव के एक दोस्त ने एक कांग्रेस नेता से गेट खोलने के लिए कहा तो उन्होंने कहा, 'गेट नहीं खुलता है'. वहीं मनमोहन सिंह ने कहा कि उन्हें इस बात की कोई जानकारी ही नहीं है. खैर, एयरपोर्ट से वायुसेना के विमान AN-32 में राव की बॉडी को हैदराबाद ले जाया गया. जहां उनका अंतिम संस्कार हुआ. विनय सीतापति अपनी किताब में लिखते हैं, राव के बेटे प्रभाकरा कहते हैं कि हमें महसूस हुआ कि सोनिया जी नहीं चाहती थीं कि हमारे पिता का अंतिम संस्कार दिल्ली में. वह यह भी नहीं चाहती थीं कि यहां उनका मेमोरियल बने. 

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