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सुप्रीम कोर्ट में टली आर्टिकल 35-A पर सुनवाई, केंद्र को दी 3 महीने की मोहलत

जम्मू-कश्मीर को विशेष अधिकार देने वाले अनुच्छेद 35-ए पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. तीन जजों की बैंच ने इस मामले की सुनवाई शुरू की.

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सुप्रीम कोर्ट में टली आर्टिकल 35-A पर सुनवाई, केंद्र को दी 3 महीने की मोहलत

जम्मू-कश्मीर को विशेष अधिकार दिए जाने पर कोर्ट ने सुनवाई को तीन महीने के लिए टाल दिया है

खास बातें

  1. 'वी द सिटिजन' संगठन ने दायर की थी जनहित याचिका
  2. 35-A को लैंगिक आधार पर भेदभाव करने वाला बताया
  3. सरकार ने कहा- यह मामला संवेदनशील और संवैधानिक
नई दिल्ली: जम्मू-कश्मीर को विशेष अधिकार देने वाले अनुच्छेद 35-ए पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. तीन जजों की बैंच ने इस मामले की सुनवाई शुरू की, लेकिन केंद्र सरकार द्वारा और समय मांगने पर सुनवाई को फिलहाल टाल दिया गया है. केंद्र सरकार की तरफ से अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने हलफनामा देकर कहा कि घाटी में शांति के लिए स्थापित करने के लिए केंद्र की ओर से मध्यस्थ (इंटर लोकेटर) नियुक्त किया गया है. और इस पर किसी भी तरह को कोई फैसला सरकार के शांति प्रयासों में बाधा उत्पन्न करेगा. इसलिए सरकार का पक्ष रखने के लिए समय दिया जाए.

पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने मामला पांच जजों की संविधान पीठ को भेजे जाने का इशारा किया था. कोर्ट ने कहा कि इस मामले में संवैधानिकता को चुनौती दी गई है इसलिए संविधान पीठ को मामला सुनना चाहिए. हालांकि इस दौरान केंद्र सरकार ने अपना रुख साफ करने से इंकार कर दिया था.

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सुप्रीम कोर्ट एक गैर सरकारी संगठन 'वी द सिटिजन' की जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहा है. याचिका में अनुच्छेद-35 A की संवैधानिक वैघता को चुनौती दी गई है. याचिका में कहा गया है कि अनुच्छेद-35 ए और अनुच्छेद-370 के तहत जम्मू एवं कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा मिला हुआ है, लेकिन ये प्रावधान उन लोगों के साथ भेदभावपूर्ण है जो दूसरे राज्यों से आकर वहां बसे हैं. ऐसे लोग न तो वहां संपत्ति खरीद सकते हैं और न ही सरकारी नौकरी प्राप्त कर सकते हैं. साथ ही स्थानीय चुनावों में उन्हें वोट देने पर पाबंदी है. याचिका में यह भी कहा गया कि राष्ट्रपति को आदेश के जरिए संविधान में फेरबदल करने का अधिकार नहीं है. 

पढ़ें: जम्मू-कश्मीर से '35A' हटाने के लिए याचिका, बताया गया लैंगिक भेदभाव वाला आर्टिकल

गौरतलब है कि 1954 में राष्ट्रपति के आदेश के तहत संविधान में अनुच्छेद-35 A को जोड़ा गया गया था. अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा था कि यह मामला संवेदनशील है. साथ ही यह संवैधानिक मसला है. उन्होंने कहा कि इस मसले पर बड़ी बहस की दरकार है. 

उन्होंने कहा कि इस मसले पर सरकार हलफनामा नहीं दाखिल करना चाहती. अटॉर्नी जनरल ने पीठ से गुहार की कि इस मसले को बड़ी पीठ के पास भेज दिया जाना चाहिए. इस संबंध में जम्मू एवं कश्मीर सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर कहा था कि संविधान केअनुच्छेद-35 ए के तहत राज्य के नागरिकों को विशेष अधिकार मिला हुआ है. 

VIDEO: जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 35-ए पर गरमाई सियासत
राज्य सरकार ने कहा है कि इस प्रावधान को अब तक चुनौती नहीं दी गई है. यह संविधान का स्थायी लक्षण है. इसके तहत राज्य के निवासियों को विशेष अधिकार और सुविधाएं प्रदान की गई थी. इसके तहत राज्य सरकार को अपने राज्य के निवासियों के लिए विशेष कानून बनाने का अधिकार मिला हुआ है. 

वहीं पेशे से वकील और मूलत: कश्मीरी चारूवली खुराना ने अपनी याचिका में कहा है कि ये लैंगिक भेदभाव करता है जो आर्टिकल भारत के संविधान द्वारा दिए जाने वाले समानता मौलिक अधिकार का उल्लंघन है. याचिका में कहा गया है कि संविधान ने महिला और पुरुष दोनों को समान अधिकार दिए हैं लेकिन 35-A पूरी तरह पुरुषों को अधिकार देता है. इसके तहत अगर कोई नागरिक किसी दूसरे राज्य की महिला से शादी करता है तो वो महिला भी जम्मू-कश्मीर की नागरिक बन जाती है और उसे भी स्थाई निवास प्रमाणपत्र मिल जाता है. लेकिन जो बेटी कश्मीर में पैदा हुई है अगर वो राज्य से बाहर के व्यक्ति से शादी करती है तो वो स्थायी नागरिकता का हक खो बैठती है.

याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि उमर अब्दुल्ला ने जब पायल से शादी की और फारूख अब्दुल्ला ने विदेशी महिला से शादी की तो उन्हें सारे अधिकार मिले. लेकिन याचिकाकर्ता ने राज्य से बाहर शादी की तो उनके अधिकार चले गए. इसलिए ये 35-A लैंगिक आधार पर भेदभाव करता है और इसे रद्द किया जाना चाहिए.


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