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कश्मीर में लगी पाबंदियों पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा- मुद्दे की गंभीरता के बारे में जानते हैं

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ऐसा लगता है कि सरकार के वकील इस मामले को लेकर गंभीर नहीं है. कोर्ट ने कहा कि किसी को इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए, क्योंकि मामले में गंभीरता नहीं है.

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कश्मीर में लगी पाबंदियों पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा- मुद्दे की गंभीरता के बारे में जानते हैं

प्रतीकात्मक तस्वीर

खास बातें

  1. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वहां लगाई पाबंदियों की गंभीरता को वह समझता है
  2. कोर्ट ने राज्य की ओर वकीलों के पेश नहीं होने पर नाराजगी जताई
  3. ऐसा लगता है कि सरकार के वकील इस मामले को लेकर गंभीर नहीं है
नई दिल्ली:

जम्मू-कश्मीर राज्य से केंद्र सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 के हटाने और वहां लगी पाबंदियों के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वहां लगाई पाबंदियों की गंभीरता को वह समझता है. हालांकि इसके साथ ही कोर्ट ने राज्य की ओर वकीलों के पेश नहीं होने पर नाराजगी जताई. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ऐसा लगता है कि सरकार के वकील इस मामले को लेकर गंभीर नहीं है. कोर्ट ने कहा कि किसी को इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए, क्योंकि मामले में गंभीरता नहीं है. बता दें, मंगलवार को अदालत में सुनवाई के दौरान केंद्र और जम्मू-कश्मीर सरकार का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील पेश नहीं हुए. हालांकि बाद में राज्य की और से सॉलीसिटर जनरल तुषार मेहता अदालत में पेश हुए और बताया कि वो भूमि अधिग्रहण पर संविधान पीठ में सुनवाई में थे.

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इससे पहले न्यायमूर्ति एन वी रमण, न्यायमूर्ति आर सुभाष रेड्डी और न्यायमूर्ति बी आर गवई की पीठ ने यह टिप्पणी उस वक्त की जब इस मामले में एक हस्तक्षेपकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने कहा कि नागरिकों के अधिकारों से संबंधित मामले की सुनवाई स्थगित कराके सरकार ने इसमें विलंब कर दिया है. पीठ ने इन याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान जम्मू कश्मीर प्रशासन का प्रतिनिधित्व कर रहे सालिसीटर जनरल तुषार मेहता अथवा किसी भी अतिरिक्त सालिसीटर जनरल के न्यायालय में उपस्थित नहीं रहने पर अप्रसन्नता व्यक्त की. पीठ ने कहा, ‘हम यह स्पष्ट कर रहे हैं कि किसी भी आधार पर मामले को स्थगित नहीं किया जाएगा. बेहतर होगा कि सालिसीटर जनरल इस मामले में पेश हों और बहस करें.' पीठ ने कहा, ‘हम इस विषय की गंभीरता के प्रति सचेत हैं.' लंच के बाद आगे शुरू हुई सुनवाई के दौरान न्यायालय में दो अतिरिक्त सालिसीटर जनरल उपस्थित थे.

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दवे ने अपनी बहस आगे बढ़ाते हुए कहा कि अगस्त से अक्टूबर के दौरान शीर्ष अदालत में लंबित इस मामले में कुछ नहीं हुआ, क्योंकि तीन महीने से अधिक समय से पाबंदियां लगी होने के तथ्य के बावजूद सरकार ने सुनवाई स्थगित कराई. पीठ ने जब दवे से यह पूछा कि क्या वह मामले की सुनवाई में विलंब के लिए न्यायालय की आलोचना कर रहे हैं तो उन्होंने कहा कि वह सरकार के रवैये के खिलाफ हैं. दवे ने कहा, ‘यह बहुत ही गंभीर मामला है. शीर्ष अदालत इसकी सुनवाई करने के प्रति गंभीरता दिखा रही है.' दवे ने कहा कि देश में अदालतें ही नागरिकों के अधिकारों की ‘सर्वोच्च संरक्षक' हैं और शीर्ष अदालत ने हमेशा ही लोगों के अधिकारों की रक्षा की है. उन्होंने कहा कि घाटी में करीब 70 लाख लोग रहते हैं और सरकार आतंकवाद से कश्मीर के प्रभावित होने के नाम पर इस तरह की पाबंदियों को न्यायोचित नहीं ठहरा सकती है.

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दवे ने कहा, ‘सरकार की यह दलील सिरे से अस्वीकार करनी होगी कि कश्मीर में लंबे समय से आतंकवाद होने की वजह से ही ये सारी कार्रवाई की गई है. ये नागरिकों की स्वतंत्रता और उनके अधिकारों के रास्ते में नहीं आ सकती है. कल वे कह सकते हैं कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में पाबंदियां लगाई जाएंगी. क्या सरकार ऐसा कर सकती है? वे आतंकी घटनाओं की आड़ नहीं ले सकते हैं.' दवे ने हांगकांग में लोकतंत्र समर्थक विरोध प्रदर्शन का जिक्र किया और कहा कि वहां इस तरह का कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया है. उन्होंने कहा कि हांगकांग में एक प्रतिबंध लगाया गया कि प्रदर्शनकारी मास्क नहीं लगा सकते और इसे भी वहां की शीर्ष अदालत ने कल रद्द कर दिया.



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