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वास्‍तविकता के धरातल से कल्‍पनाओं के आसमां को छू लेते थे दुष्यंत कुमार...

दुष्‍यंत कुमार की कविता 'मैं जिसे ओढ़ता -बिछाता हूं' खूब पढ़ी और सराही गई कविताओं में से एक है. इस कविता में सरल शब्दों में भावों को जिन उपमानों के साथ प्रस्‍तुत किया गया है, उनकी तारीफ जितनी की जाए कम है.

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वास्‍तविकता के धरातल से कल्‍पनाओं के आसमां को छू लेते थे दुष्यंत कुमार...

हाथों में अंगारों को लिये उनकी तासीर पूछने वाला, पीर पर्वत से किसी गंगा के निकलने की उम्‍मीद रखने वाला, हिन्दी
का कवि और शायर दुष्‍यंत कुमार उस समय में पाठकों के मन-मष्‍तिष्‍क में जगह बनाने में सक्षम हुआ, जब शायरी में क़ैफ़ भोपाली, गूढ़ हिन्दी कविताओं में अज्ञेय और मुक्तिबोध, तो आम जनता के काव्‍य पर नागार्जुन और धूमिल राज करते थे. अपने लेखन के लिए दुष्यंत को हिंदी गज़ल का सशक्त हस्ताक्षर कहा जाना सही होगा.

आधुनिक कविता में कल्‍पनाओं और बिंबों का ऐसा चित्रण दुष्‍यंत ने पेश किया, जिसे जिसने भी पढ़ा वह उनकी कल्‍पनाओं और बिंबों में जीने लगा. दुष्‍यंत ने प्रेम और मानव मन की कोमल भावनाओं को जितनी सुंदरता से लिखा उतनी ही सटीकता, कटुता और दृढ़ता से उन्‍होंने आम जन के मन की बात, दुःख और संदेहों को अपने लेखन में उकेरा.
 
ऐसा लगता है जैसे दुष्‍यंत की कविता में उनकी कल्‍पनाओं के परजीवी रहते हैं. उन्‍होंने एक कविता में अपने ही स्‍वप्‍नों को कहा-

जा तेरे स्वप्न बड़े हों.
भावना की गोद से उतर कर
जल्द पृथ्वी पर चलना सीखें.
चांद तारों सी अप्राप्य ऊंचाइयों के लिये
रूठना मचलना सीखें.
हंसें

मुस्कुराएं
गाएं...


दुष्‍यंत कुमार की कविता 'मैं जिसे ओढ़ता -बिछाता हूं' खूब पढ़ी और सराही गई कविताओं में से एक है. इस कविता में सरल शब्दों में भावों को जिन उपमानों के साथ प्रस्‍तुत किया गया है, उनकी तारीफ जितनी की जाए कम है.

मैं जिसे ओढ़ता -बिछाता हूं,
वो गज़ल आपको सुनाता हूं.

एक जंगल है तेरी आंखों में
मैं जहां राह भूल जाता हूं.

तू किसी रेल सी गुजरती है,
मैं किसी पुल -सा थरथराता हूं.

फिल्‍म मसान में इसी कविता को इस्‍तेमाल किया गया.

दुष्‍यंत की कल्‍पनाएं महज प्रेम तक सीमित नहीं. वास्‍तविकता के धरातल से कल्‍पनाओं के आसमां को छू लेते थे. उन्‍होंने लेखन केवल स्वांतः सुखाय नहीं किया. उनकी रचनाओं के सृजन के मूल लक्ष्‍य में जन-जागरण भी रहा-

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए.

इसी कविता में वह कहते हैं कि कहीं न कहीं परिवर्तन की जरूरत है. वह चाहें कहीं से भी शुरू हो.

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए.

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दुष्‍यंत की प्रमुख कविताएं
'बाढ़ की संभावनाएं','आज सड़कों पर लिखे हैं', 'मत कहो, आकाश में', 'कहां तो तय था', 'कैसे मंजर', 'खंडहर बचे हुए हैं', 'जो शहतीर है', 'ज़िंदगानी का कोई', 'मकसद', 'मुक्तक', 'आग जलती रहे', 'एक आशीर्वाद', 'आग जलनी चाहिए', 'धूप के पाँव', 'गुच्छे भर', 'अमलतास', 'सूर्य का स्वागत', 'आवाजों के घेरे', 'जलते हुए वन का वसन्त', 'आज सड़कों पर', 'मापदण्ड बदलो', 'कहीं पे धूप की चादर', 'इस नदी की धार में', 'हो गई है पीर पर्वत-सी'

संग्रह
जलते हुए वन का वसन्त (कविता संग्रह)
सूर्य का स्वागत (कविता संग्रह)
आवाज़ों के घेरे (कविता संग्रह)
साये में धूप (ग़ज़ल संग्रह)
एक कंठ विषपायी (काव्य नाटिका)

 

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