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लालू यादव के दावे और नीतीश कुमार के महागठबंधन में वापस जाने की कहानी के पीछे की क्या है सच्चाई?

लोकसभा चुनाव 2019 के मद्देनजर बिहार में पहले चरण के चुनाव के लिए प्रचार अभियान चरम पर है. मगर इस बीच राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव द्वारा लिखी एक किताब में हुए खुलासे ने एक नए सियासी विवाद को पैदा कर दिया है

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लालू यादव के दावे और नीतीश कुमार के महागठबंधन में वापस जाने की कहानी के पीछे की क्या है सच्चाई?

लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार (फाइल फोटो)

खास बातें

  1. लालू यादव की किताब पर सियासत फिर गरमा गई है.
  2. लालू यादव ने दावा किया कि नीतीश ने बाद में उनसे संपर्क किया था.
  3. इसके लिए प्रशांत किशोर मीडिएटर की भूमिका में थे.
पटना:

लोकसभा चुनाव 2019 के मद्देनजर बिहार में पहले चरण के चुनाव के लिए प्रचार अभियान चरम पर है. मगर इस बीच राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव द्वारा लिखी एक किताब में हुए खुलासे ने एक नए सियासी विवाद को पैदा कर दिया है. लालू प्रसाद यादव ने अपनी आत्मकथा- 'गोपालगंज टू रायसीना: माई पॉलिटकिल जर्नी' में कहा है कि नीतीश ने महागठबंधन छोड़कर जाने के 6 महीने के अंदर ही ये कोशिश की थी. लालू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि उनसे बातचीत के लिए नीतीश कुमार ने 5 बार जेडीयू उपाध्यक्ष और अपने विश्वासपात्र प्रशांत किशोर को भेजा था. मगर लालू प्रसाद ने इस प्रयास को खारिज कर दिया था. 

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लालू यादव के अनुसार इस पूरी मुहिम के सूत्रधार चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोऱ थे, जो अब जनता दल यूनाइटेड के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं. विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने यह कह कर के और भी पुष्टि की है कि प्रशांत किशोर उनसे भी कई बार मिले थे. दिलचस्प है कि प्रशांत किशोऱ ने भी इन बैठकों से कभी इनकार नहीं किया है. हालांकि, उन्होंने ट्वीट कर अपना पक्ष रखा है और लालू यादव के इस दावे को पूरी तरह बेबुनियाद बताया है.


शुक्रवार की शाम में तेजस्वी और प्रशांत किशोर के बीच ट्विटर पर वाक युद्ध चला. जानकारों का कहना है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस बातचीत की प्रक्रिया में शामिल थे और ये जो बातचीत का दौर चला उसमें प्रशांत किशोर और लालू या प्रशांत किशोर और तेजस्वी इन सबके बीच एक कड़ी कांग्रेस पार्टी की भी थी.

दरअसल नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ वापस गठबंधन करने के बाद राज्य के स्तर पर तो काफ़ी आराम से अपने पुराने अंदाज़ में सरकार चलाना शुरू कर दिया था. लेकिन केंद्र से जो उनकी उम्मीद और अपेक्षा थी, खासकर बिहार को लेकर और अपने राजनीतिक भूमिका को लेकर, वह कहीं से भी मुक्कमल होती नहीं दिख रही थी. सीएम नीतीश को लग रहा था कि भाजपा उन्हें ज़्यादा भाव नहीं दे रही है और हो सकता है कि लोकसभा चुनाव में उन्हें उनके मन मुताबिक़ सीटें भी नहीं मिले. इसलिए वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह दोनों से खुले तौर पर कभी भी नाराज़ तो नहीं दिखे, मगर कभी उतने प्रसन्न भी नहीं रहे. 

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इस बीच कांग्रेस पार्टी को भी ये लगने लगा था कि अगर नीतीश महागठबंधन में वापस आ जाते हैं तो एक बार फिर बिहार की राजनीति में न केवल कांग्रेस की वापसी हो सकती है, बल्कि लोकसभा चुनाव में भी अधिक से अधिक सीटें जीतने का लक्ष्य भी पाया जा सकता है. लेकिन सबको मालूम था कि इसके लिए राजद अध्यक्ष लालू यादव का राजी होना और उनका समर्थन होना दोनों ज़रूरी है. उसके बिना कोई सरकार नहीं बन सकती है. हां, लेकिन प्रशांत किशोर ने जो भी बातचीत की और उस बातचीत में सरकार बनने की स्थिति में तेजस्वी के लिए कोई भूमिका सरकार में नहीं दिख रही थी क्योंकि वो भी रेलवे होटल मामले में चार्जशीटेड हो चुके थे. 

कांग्रेस पार्टी भी चार्जशीट दायर होने के बाद किसी व्यक्ति को उप मुख्यमंत्री बनाए जाने के पक्ष में नहीं थी. यही एक ऐसा कारण था जो लालू यादव को नागवार गुज़रा और उन्होंने इस पूरे मुहिम में कभी ज़्यादा उत्सुकता नहीं दिखाई. इसके अलावा, तेजस्वी यादव की बढ़ रही लोकप्रियता से लालू यादव भी अवगत थे. उन्हें मालूम हो गया था कि जब उन्हें सहयोगियों का साथ मिल रहा है, तेजस्वी को भी सभी सीएम कैंडिडेट फेस के रूप में धीरे-धीरे स्वीकार्यता मिल रही है तो फिर वह दोबारा इन पचड़ों में नहीं फंसना चाहते थे. यही वजह है कि लालू यादव नए सिरे से चुनाव में जाने के लिए तैयार थे. नीतीश कुमार के उस प्रस्ताव पर काम करके वह अपना राजनीतिक क़ब्र नहीं खोदना चाहते थे. इसके अलावा लालू यादव के परिवार में अधिकांश लोग नीतीश कुमार के रवैये से दुखी थे. नीतीश के रवैये से ख़ासकर राबड़ी देवी दुखित थीं और उन्होंने भी ऐसे प्रस्ताव को मानने से भी असहमति जता दी थी. 

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इस बीच बिहार बीजेपी के नेताओं को इस बातचीत की जानकारी हो गई थी की राजनीतिक रूप से बिहार में क्या सियासी खिचड़ी पक रही है. बिहार में पक रही राजनीतिक खिचड़ी का अंदाज़ा होने के बाद बीजेपी नेताओं ने अपने पार्टी आलाकमान को इस बात से अवगत करा दिया था. बिहार के बीजेपी नेतृत्व को इस बात का भी आभास हो गया था चुनाव में नीतीश कुमार के बिना जाना महंगा सौदा साबित हो सकता है. यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बीच बराबरी पर सहमति बनी.

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