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इस ट्रांसजेंडर ने ट्रेनों में भीख मांगकर पैसे जुटाए और फिर कायम की मिसाल

समाज के तानों से परिवार छूटा और फिर आग में झुलसने से बधाई गाने का काम छूट गया तो बेटियों के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया वाराणसी की किन्नर गुड़िया ने

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इस ट्रांसजेंडर ने ट्रेनों में भीख मांगकर पैसे जुटाए और फिर कायम की मिसाल

वाराणसी में ट्रांसजेंडर गुड़िया दो लड़कियों को पाल रही है और उन्हें शिक्षित कर रही है.

खास बातें

  1. दो पॉवरलूम लगाए और उससे गुजर-बसर का इंतजाम किया
  2. गुड़िया दो लड़कियों को पाल रही है और शिक्षित भी कर रही है
  3. 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' की बड़ी मिसाल पेश कर रही गुड़िया
वाराणसी:

रामनगर के चौरहट की निवासी किन्नर गुड़िया ने समाज के सामने एक नज़ीर पेश की है. जहां लोग बेटियों को खत्म करने में लगे हैं वहीं गुड़िया दो बेटियों को गोद लेकर उनकी परवरिश कर रही है.  

गुड़िया जब पैदा हुई  तो उसके परिवार वालों पर ख़ुशी के बजाय दुख का पहाड़ टूट पड़ा क्योंकि वह किन्नर थी. भारी मन से परिवार ने उसे पाला,  लेकिन जब वह 16 साल की हुई तो समाज के तानों ने उससे घर छुड़वा दिया. ढाई साल बाद घर लौटी और बड़े भाई की इजाजत से अपनी गुरु रोशनी के साथ मंडली में बधाई गाने के लिए जाने लगी. यहां भी जिंदगी उसका कड़ा इम्तिहान ले रही थी. खाना बनाते समय सिलेंडर फटने से उसके शरीर का काफी हिस्सा झुलस गया. इस घटना के बाद बधाई गाने का काम भी छूट गया. इसके बाद उसके पांव भीख मांगने के लिए ट्रेन की तरफ बढ़ चले.  

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गुड़िया भारी मन से बताती है कि  "जब हम बधाई के काम में जाते रहे तो लोग कहते थे ये जली है. लोग शमशान से पहले जल जाता है. तुम शमशान से उठकर आई. मेरे गुरु की दाल-रोटी झिनने लगी तो हमने गुरु का साथ छोड़ दिया और ट्रेन में भीख मांगने लगे." गुड़िया के पैर भीख मांगने के लिए  बढ़े तो जरूर थे लेकिन इस बार ज़िंदगी की हर मुश्किल को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए. उसने ट्रेन में मांगे गए पैसों से दो पॉवरलूम लगाए और उससे गुजर-बसर का इंतज़ाम किया.  

 
transgender gudiya varanasi

गुड़िया ने इसके बाद बड़े मकसद की तरफ कदम बढ़ाया. यह कदम था 'बेटी पढ़ाओ-बेटी बचाओ' का. उसने दो बेटियों को गोद लिया और उनकी तामील में खुद को झोंक दिया. अब वह ट्रेन में भीख नहीं मांगती बल्कि मुल्क में बेटियों को पढ़ाने और बचाने के लिए बड़ी मिसाल पेश कर रही है. गुड़िया, बेटियों को लेकर कहती है कि "आज अगर बेटी को पढ़ाएंगे लिखाएंगे, अच्छा भविष्य देंगे तो मेरी बेटी बेटा से कम नहीं होगी. मेरी बड़ी बेटी विकलांग है, वह उतना पढ़ नहीं पाती और छोटी लड़की के बारे में तो हमारी दिल में तमन्ना है कि उसको डॉक्टर बनाएंगे.''  
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गुड़िया ने जन्म के बाद जिंदगी की दुश्वारियों को बहुत नजदीक से देखा था. समाज और परिवार से उपेक्षित गुड़िया को सिर्फ भाई और भाभी ने जिंदगी जीने का हौसला दिया. लिहाजा भाई के उस क़र्ज़ को वह उसकी दिव्यांग बेटी को गोद लेकर उतार रही है. भाई की उस बच्ची को गुड़िया न सिर्फ  दीनी तालीम दे रही है बल्कि उसे पॉवरलूम की बारीकियां भी सिखाकर अपने पैरों पर खड़े होने की हिम्मत दे रही है. साफ है कि जिस समाज ने किन्नर होने का दंश झेल रही गुड़िया के सामाजिक ताने-बाने में जितनी मुश्किलें खड़ी की, गुड़िया अपने उतने ही बड़े हौसले से करघे के जरिए न सिर्फ ज़िंदगी की खुशनुमा चादर बना रही है बल्कि बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का बड़ा संदेश भी समाज को दे रही है.



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