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शेयर बाजार को भी पूरा दिन लगा बजट समझने में

हालांकि ऐसा भी नहीं था कि बजट की चतुराइयों को पकड़ने का कोई इंतजाम न हो. मसलन शेयर बाजार इस मामले में बड़ी पैनी नज़र रखता है.

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शेयर बाजार को भी पूरा दिन लगा बजट समझने में

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 1 फरवरी को बजट पेश किया था.

नई दिल्ली: बहुत ही कम होता है कि  आम बजट  की समीक्षाएं एक दिन से ज्यादा चलती हों. बजट में जिस भी तबके से लिया और जिस तबके को दिया जाता है उसका पता बजट भाषण के दौरान ही हो जाता था. इस बार ऐसा नहीं हुआ. बजट वाले पूरे दिन पता ही नहीं चला कि इससे आने वाले साल में किसे फायदा होगा और किसे नुकसान. हालांकि ऐसा भी नहीं था कि बजट की चतुराइयों को पकड़ने का कोई इंतजाम न हो. मसलन शेयर बाजार इस मामले में बड़ी पैनी नज़र रखता है. कुछ साल पहले तक बजट पेश ही तब हुआ करता था जब शेयर बाजार का कामकाज बंद हो जाया करता था. अब बजट दोपहर 11 बजे होने लगा तो शेयर बाजार बजट भाषण के हर वाक्य के मुताबिक बजट ऊपर-नीचे होता चलता है. इस बार भी शेयर बाजार ने पल पल की नज़र रखी. लेकिन यह पहली बार है कि शेयर बाजार को हाल के हाल समझ में ही नहीं आ पा रहा था कि वह किस प्रकार की प्रतिक्रिया दे.

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बाजार ने क्या रुख दिखाया बजट के दिन
बजट पेश होते समय शुरू से आखिर तक वह अपनी कोई निश्चित प्रक्रिया नहीं दिखा पाया. हालांकि बाजार में गिरावट का रुख रहा. लेकिन ढाई तीन सौ अंक गिरकर संभलता भी रहा और कारोबार के आखिरी घंटे तक कोई सनसनीखेज गिरावट नहीं दिखी. यह आश्चर्यजनक था. जो भी शेयर बाजार के जानकार हैं वे अच्छी तरह से जानते हैं कि शेयर बाजार को किसी भी बड़ी घटना की तलाश होती है और उससे बनी धारणा से ही वह दोलन करता है. बजट जैसी सबसे बड़ी आर्थिक घटना का कोई असर न पड़े यह आश्चर्यजनक था. इसका जवाब यही बन सकता है कि देश के निवेशकों को पहले ही दिन यह जटिल  बजट साफ साफ समझ में ही नहीं आया. मीडिया में बजट को समझने समझाने की जो कवायद हो रही थी वह सरकारी और गैरसरकारी नोकझोंक में ऐसी उलझी कि निवेशक हाल के हाल कोई धारणा नहीं बना पाए. इसे हम सरकारी विशेषज्ञों और मीडिया के एक तबके का कुशल प्रबंधन मान सकते हैं कि उन्होंने शेयर बाजार तक को गफलत में डाल दिया.
बहरहाल बजट पेश होने के दिन न सही लेकिन अगले दिन यानी आज शुक्रवार को शुरू से ही शेयर बाजार ने बजट पर अपनी दहशत भरी प्रतिक्रिया देनी शुरू कर दी.

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बजट के एक दिन बाद बाजार और मीडिया का रुख
बजट की पहेली बूझने के लिए मीडिया और निवेशकों को काफी समय लगा. बजट के दिन मीडिया में यह बहस मुबाहिसा चला कि इस बजट ने किस तबके को फायदा होगा. पहले दिन जो धारणा बनाई जा रही थी कि यह बजट किसानों, महिलाओं और गरीबों के पक्ष का बजट है वह धारणा शाम तक खत्म होती दिखी. अब बात आई कि फिर किसे फायदा हुआ. फिर निवेशकों को यह समझना था कि उद्योग व्यापार जगत को क्या सुविधाएं बढ़कर मिलीं? सो हिसाब लगाकर उसे यही संतोष करना पड़ा होगा कि उस पर ज्यादा बोझ नहीं बढ़ा है. लेकिन लगता है कि यह संतोष उत्साहजनक नहीं था. उसे देश में आर्थिक गतिविधियां बढ़ने यानी उद्योग व्यापार के अनुकूल माहौल बनने का इंतजार था और तभी वह निश्चितंता के साथ निवेश करने को प्रोत्साहित होता. एक दिन के हिसाब किताब लगाने के बाद यह धारणा बनी कि आने वाले समय में शेयर बाजार उसके लिए ठीक नहीं. आखिर अगले दिन सबेरे से ही शेयर बाजार से पैसा गायब होना शुरू हुआ. सेंसेक्स ढहने लगा. इस कदर ढहा कि कामकाज बंद होने के समय वह 888 अंक का गोता लगा गया.
  
बजट की इस बोर दुपहरी में झोला उठाने का टाइम आ गया है...

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व्यापार पत्रकारिता से भी नहीं संभले हालात
हरचंद कोशिश हुई कि शेयर बाजार में तबाही का बजट से संबंध न बन पाए. लेकिन इस क्षेत्र की पत्रकारिता को कोई भी दूसरा कारण नहीं मिल पाया. दूसरे एशियाई बाजारों के असर को दिखाने की भी कोशिश हुई. लेकिन उसके आकार और भिन्न समय के कारण यह साबित नहीं किया जा सका कि शेयर बाजार पर बजट के अलावा कोई बाहरी या ऊपरी असर पड़ गया. आखिर शेयर बाजार का कामकाज बंद होने के बाद बिजनेस न्यूज टीवी चैनलों को आखिर यह चर्चा करनी ही पड़ी कि इस बजट ने उद्योग व्यापार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं और यह भी कि उद्योग व्यापार के लिए सबसे जरूरी शर्त यानी उपभोक्ताओं की जेब में किसी तरह पैसा डालने का भी काम नहीं हुआ. निवेशकों में निराशा बढ़ने के लिए यह बहुत बड़ी धारणा थी.



कितना फर्क पड़ा बाजार के हताश होने से
बजट के अगले दिन शेयर धड़ाम होने से एक ही झटके में पांच लाख करोड़ रुपए का नुकसान हो गया. भले ही कोई यह दिलासा दिलाए कि सरकार आगे अपने निवेशकों को उत्साहित करने के लिए दूसरे ऐलान कर देगी लेकिन इस तरह की भरपाई में बाजार को लंबा इंतजार करना पड़ता है. बजट आकस्मिक घटना नहीं है. इसे शेयर बाजार की भाषा में फंडामेंटल कहा जाता है यानी वह प्रवृत्ति जो स्थायी या दीर्धकालिक प्रभाव दिखाती ही दिखाती है. जानकार और विशेषज्ञ यह भी बता रहे हैं कि इस झटके से उबरने के लिए शेयर बाजार को बजट के टक्कर की घटना के जरिए किसी खुशखबरी की ही जरूरत पड़ेगी. इस बारे में एक अंदाजा यह लगाया जा सकता है कि जब सरकार अपनी लोकप्रिय योजनाओं और कार्यक्रमों के लिए पैसे का प्रबंध नहीं कर सकी तो निवेशकों के प्रोत्साहन के लिए निकट वर्ष में क्या कर पाएगी. यानी अगर शेयर बाजार किसी नई धारणा के सहारे पनपा भी तो वह संभाल अस्थायी ही होगी. शेयर बाजार को बजट का एक समीक्षक मानें तो देश की आर्थिक गतिविधियों के लिहाज़ से यह बजट खराब संकेत दे रहा है.
 


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