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Chhath Puja 2017: ये हैं भारत के बड़े सूर्य मंदिर, जानें इनका इतिहास

चार दिन तक चलने वाले इस महापर्व की शुरुआत कार्तिक मास के शुक्लपक्ष चतुर्थी से शुरु होता है. इस साल छठ का पर्व 24 अक्टूबर से शुरू हो रहा है.

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Chhath Puja 2017: ये हैं भारत के बड़े सूर्य मंदिर, जानें इनका इतिहास

Chhath Puja 2017: छठी मइया की पूजा की जाती है और भगवान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है.

सूर्य की उपासना का महापर्व छठ बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में बड़े पैमाने पर मनाया जाता है. इस मौके पर छठी मइया की पूजा की जाती है और भगवान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. चार दिन तक चलने वाले इस महापर्व की शुरुआत कार्तिक मास के शुक्लपक्ष चतुर्थी से शुरु होता है. इस साल छठ का पर्व 24 अक्टूबर से शुरू हो रहा है. सूर्य उपासना के इस महापर्व के मौके पर कहा जाता है कि इस दिन सूर्य देव की आराधना करने से जीवन से सारी परेशानियां दूर हो जाती हैं. छठ के इस विशेष मौके पर हम आपको बताने जा रहे हैं देशभर के बड़े सूर्य मंदिरों के बारे में जो काफी प्राचीन माने जाते हैं.

साल में दो बार होता है छठ का पर्व
छठ का पर्व एक साल में दो बार आता है. पहली बार चैत्र महीने में और दूसरी बार कार्तिक महीने में. हिन्दू पंचांग के अनुसार चैत्र शुक्लपक्ष की षष्ठी पर मनाए जाने वाले छठ त्‍योहार को चैती छठ कहा जाता है, जबकि कार्तिक शुक्लपक्ष की षष्ठी पर मनाए जाने वाले इस त्‍योहार को कार्तिकी छठ कहा जाता है. बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में यह त्‍योहार काफी धूमधाम से मनाया जाता है. इस त्‍योहार को यहां पर पारिवारिक सुख-समृद्धि और मनोवांछित फल-प्राप्ति के लिए मनाया जाता है.

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पश्चिमाभिमुख देव सूर्य मंदिर, औरंगाबाद (बिहार)
बिहार के औरंगाबाद जिले का देव सूर्य मंदिर सूर्योपासना के लिए सदियों से आस्था का केंद्र बना हुआ है. ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टिकोण से विश्व प्रसिद्ध त्रेतायुगीन इस मंदिर परिसर में हर साल चैत्र और कार्तिक माह में महापर्व छठ व्रत करने वालों की भीड़ उमड़ पड़ती है. पश्चिमाभिमुख देव सूर्य मंदिर की अभूतपूर्व स्थापत्य कला इसकी कलात्मक भव्यता दर्शाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसका निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने स्वयं अपने हाथों से किया था.

कोणार्क सूर्य मंदिर, पुरी (उड़ीसा)
उड़ीसा का कोणार्क सूर्य मंदिर दुनियाभर में प्रसिद्ध है. रथ के आकार में बनाया गया यह मंदिर भारत की मध्यकालीन वास्तुकला का अनोखा उदाहरण है. इस सूर्य मंदिर का निर्माण राजा नरसिंहदेव ने 13वीं शताब्दी में करवाया था. मंदिर अपने विशिष्ट आकार और शिल्पकला के लिए दुनिया भर में जाना जाता है. सूर्य देवता के रथ में बारह जोड़ी पहिए हैं और रथ को खींचने के लिए उसमें 7 घोड़े जुते हुए हैं.

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Chhath Puja 2017:  इस सूर्य मंदिर का निर्माण राजा नरसिंहदेव ने करवाया था. 

सूर्य मंदिर, रांची (झारखंड)
झारखंड की राजधानी रांची से 39 किलोमीटर की दूर रांची-टाटा हाईवे पर बना यह सूर्य मंदिर बुंडू के पास है. 7 संगमरमर से बने इस मंदिर का निर्माण 18 पहियों और 7 घोड़ों के रथ पर विराजित भगवान सूर्य के रूप में किया गया है. 25 जनवरी को हर साल यहां विशेष मेले का आयोजन होता है.

विवस्वान सूर्य मंदिर, ग्वालियर (मध्यप्रदेश)
मध्यप्रदेश के ग्वालियर के सूर्य मंदिर की भव्यता अनूठी है. शहर के मुरार इलाके में स्थित विवस्वान सूर्य मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा 23 जनवरी, 1988 को की गई थी. मंदिर का उद्घाटन बसंत कुमार बिड़ला ने किया था. पूर्व रुख वाले इस मंदिर में सात घोड़ों पर सवार सूर्य के दर्शन किए जा सकते हैं. मंदिर का रुख पूर्व की ओर होने के कारण सुबह के सूर्य की पहली किरणें जब मंदिर के प्रवेश द्वार को चूमती हैं तो मंदिर का सौंदर्य अनूठा दिखाई देता है. बाहर से लाल पत्थर से बने पूरे मंदिर की आकृति किसी भव्य रथ जैसी है, जिसमें दोनों तरफ 16 पहिए लगे हुए हैं.

बेलार्क सूर्य मंदिर, भोजपुर (बिहार)
इस मंदिर का निर्माण राजा सूबा ने करवाया था बाद मे बेलाउर गांव में कुल 52 पोखरा (तालाब) का निर्माण कराने वाले राजा सूबा को राजा बावन सूब के नाम से पुकारा जाने लगा. बिहार के भोजपुर जिले के बेलाउर गांव के पश्चिमी एवं दक्षिणी छोर पर अवस्थित वेलाउर सूर्य मंदिर काफी प्राचीन है. राजा द्वारा बनवाए 52 पोखरों मे एक पोखर के मध्य में यह सूर्य मन्दिर स्थित है. यहां छठ महापर्व के दौरान हर साल एक लाख से ज्यादा श्रद्धालु आते हैं जिनमें उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश के श्रद्धालु भी होते हैं. ऐसा कहा जाता है कि सच्चे मन से इस स्थान पर छठ व्रत करने वालों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती है तथा कई रोग-व्याधियों से भी मुक्ति मिलती है.
 

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Chhath Puja 2017: सूर्योदय होने पर सूर्य की पहली किरण मंदिर के गर्भगृह को रोशन करती है.
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मोढ़ेरा सूर्य मंदिर, पाटन (गुजरात)
ये मंदिर गुजरात के मोढ़ेरा में स्थित है. यह मंदिर अहमदाबाद से लगभग 100 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. इस मंदिर का निर्माण सम्राट भीमदेव सोलंकी प्रथम ने करवाया था. यहां पर इसके संबंध में एक शिलालेख भी मिलता है. वे सूर्य को कुलदेवता के रूप में पूजते थे. मंदिर के गर्भगृह के अंदर की लंबाई 51 फुट 9 इंच तथा चौड़ाई 25 फुट 8 इंच है. मंदिर के सभामंडप में कुल 52 स्तंभ हैं. इस मंदिर का निर्माण कुछ इस तरह किया गया था कि जिसमें सूर्योदय होने पर सूर्य की पहली किरण मंदिर के गर्भगृह को रोशन करे. सभामंडप के आगे एक विशाल कुंड स्थित है जिसे लोग सूर्यकुंड या रामकुंड के नाम से जानते हैं.

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