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पीएम नरेंद्र मोदी के एक फैसले के बाद बीजेपी उसके सहयोगियों की मजबूरी बन गई

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत की, बीजेपी के घोर विरोधी भी सरकार के फैसले को समर्थन देने में होड़ लगा रहे

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पीएम नरेंद्र मोदी के एक फैसले के बाद बीजेपी उसके सहयोगियों की मजबूरी बन गई

पीएम नरेंद्र मोदी की सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का ऐतिहासिक फैसला लिया.

खास बातें

  1. नीतीश कुमार अपने पुराने स्टैंड पर कायम, विरोध के साथ मदद
  2. हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड के विधानसभा चुनाव में दिखेगा असर
  3. बीजेपी बिहार के चुनाव में जेडीयू से अपनी शर्तों पर करेगी समझौता
पटना:

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने अपने एक निर्णय से राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत कर दी है जिससे भाजपा (BJP) के सहयोगी भी अब उसके बिना नहीं चलने वाले. केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह (Amit Shah) ने राज्यसभा में जैसे ही आर्टिकल 370 (Article 370) को खत्म करने की घोषणा की तो पहली बार सदन के अंदर और बाहर इस मुद्दे पर समर्थन करने की बीजेपी के विरोधियों में भी होड़ दिखी. बीजेपी के एक सहयोगी जनता दल यूनाइटेड के अलावा हर सहयोगी के मुंह से वाह-वाह निकल रहा था. बीजेपी की घोर विरोधी बहुजन समाज पार्टी (BSP), अरविंद केजरीवाल की 'आप' (AAP), चंद्रबाबू नायडू की तेलगू देशम और उसके अलावा हर मुद्दे पर अपना अलग स्टैंड लेने वाली जगनमोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस ने जहां इस मुद्दे पर अपना समर्थन देने में कोई देरी नहीं की वहीं जनता दल यूनाइटेड ने अपना वही पुराना विरोध का राग छेड़ा. लेकिन उसने वोटिंग की स्थिति आने पर बीजेपी के नेताओं को साफ संदेश दे दिया कि ट्रिपल तलाक की तरह वह सदन का बहिष्कार कर सरकार की मदद करेगी.

जानकारों का मानना है कि सरकार के इस कदम का भाजपा को केवल राजनीतिक लाभ ही लाभ होगा. उसे समर्थन करने वाले नए सहयोगी मिल गए और अब भाजपा अपने सहयोगियों की मजबूरी होगी. कोई भी सहयोगी वह चाहे शिव सेना हो या जनता दल यूनाइटेड, अब अपनी मनमानी करने की कोशिश नहीं कर सकता.


दो माह बाद तीन राज्यों हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड में चुनाव होने हैं. वहां पर छोटे सहयोगी हों या बड़े, भाजपा अब सबकी मजबूरी हो गई है. आज की तारीख में इस मुद्दे पर जिस प्रकार से लोगों में ध्रुवीकरण हो रहा है वैसे में अगर भाजपा अकेले ही चुनाव में जाए तो बहुमत का आंकड़ा पाने में उसे मुश्किलों का सामना नहीं करना पड़ेगा.

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दूसरी तरफ अगले साल जैसे बिहार में चुनाव होने हैं वहां मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने खुद इस बात के संकेत दिए हैं कि भाजपा के बिना चुनाव में जाने के विकल्प पर वे फिलहाल विचार नहीं कर रहे हैं क्योंकि बिहार में उनकी सरकार बिना किसी हस्तक्षेप के चल रही है. लेकिन नीतीश को भी मालूम है कि जिस प्रकार उन्होंने लोकसभा चुनावों में बराबर सीटों की शेयरिंग की है, विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी अपनी शर्तों पर तालमेल करने की कोशिश करेगी. किन्हीं मुद्दों पर नीतीश कुमार का स्टैंड देश की राजनीति में अब कोई मायने नहीं रखता, जो कुछ भी वे कर रहे हैं वह मात्र सांकेतिक है.

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