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निडर पायलट और सैन्य नेतृत्व के महारथी थे मार्शल अर्जन सिंह

मार्शल अर्जन सिंह हमेशा 1965 के भारत-पाक युद्ध के नायक के रूप में याद किए जाएंगे

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निडर पायलट और सैन्य नेतृत्व के महारथी थे मार्शल अर्जन सिंह

अर्जन सिंह (फाइल फोटो).

खास बातें

  1. पाक को अमेरिकी मदद मिलने के बावजूद पराजित किया
  2. 19 वर्ष की उम्र में रॉयल एयर फोर्स का एम्पायर पायलट प्रशिक्षण लिया
  3. साल 1944 में जापान के खिलाफ एक स्क्वैड्रन का नेतृत्व किया था
नई दिल्ली: वायु सेना के मार्शल अर्जन सिंह हमेशा एक युद्ध नायक के रूप में याद किए जाएंगे जिन्होंने सफलतापूर्वक 1965 के भारत-पाक युद्ध का नेतृत्व किया था.

वह वायु सेना के एकमात्र अधिकारी हैं जिन्होंने मार्शल का उच्चतम पद हासिल किया जो थानासेना के पांच सितारा फील्ड मार्शल के बराबर होता है. सिंह एक निडर और अद्वितीय पायलट थे जिन्होंने 60 विभिन्न तरीके के विमान उड़ाए थे. भारतीय वायु सेना को दुनिया की सर्वाधिक सक्षम वायु सेनाओं में से एक और दुनिया की चौथी सबसे बड़ी वायु सेना बनाने में उन्होंने महती भूमिका निभाई.

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आईएएफ के पूर्व उप प्रमुख कपिल काक ने कहा, ‘‘भारतीय वायु सेना के लिए उनका योगदान अविस्मरणीय है. आईएएफ उनके साथ आगे बढ़ी. वह अद्भुत विवेक वाले सैन्य नेतृत्व के महारथी थे और इसलिए यह आश्चर्यजनक नहीं है कि उन्हें वायु सेना में मार्शल रैंक से सम्मानित किया गया.’’ सिंह को 2002 में गणतंत्र दिवस के अवसर पर मार्शल रैंक से सम्मानित किया गया था. सैम होरमुसजी फ्रामजी जमशेदजी मानेकशॉ और केएम करियप्पा ही केवल दो सैन्य जनरल थे जिन्हें फील्ड मार्शल की रैंक से सम्मानित किया गया था.

सिंह को न केवल निडर पायलट के रूप में जाना जाता था बल्कि उन्हें वायु शक्ति की काफी जानकारी थी और कई क्षेत्रों में उन्होंने इसका इस्तेमाल किया. 1965 की लड़ाई का सिंह ने नेतृत्व किया और पाकिस्तानी वायुसेना को जीत हासिल नहीं करने दी जबकि अमेरिकी सहयोग के कारण वह ज्यादा बेहतर सुसज्जित थी.

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काक ने कहा, ‘‘उनका सर्वाधिक यादगार योगदान उस युद्ध में था.’’ युद्ध में उनकी भूमिका की प्रशंसा करते हुए तत्कालीन रक्षा मंत्री वाईबी चव्हाण ने लिखा था, ‘‘एयर मार्शल अर्जन एक असाधारण व्यक्ति हैं, काफी सक्षम और दृढ़ हैं, काफी सक्षम नेतृत्व देने वाले हैं.’’ मार्शल ने अराकान अभियान के दौरान 1944 में जापान के खिलाफ एक स्क्वैड्रन का नेतृत्व किया था, इम्फाल अभियान के दौरान हवाई अभियान को अंजाम दिया और बाद में यांगून में अलायड फोर्सेज का काफी सहयोग किया. उनके इस योगदान के लिए दक्षिण पूर्व एशिया के सुप्रीम अलायड कमांडर ने उन्हें विशिष्ट फ्लाइंग क्रास से सम्मानित किया था और वह इसे प्राप्त करने वाले पहले पायलट थे.

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सिंह 1938 में रॉयल एयर फोर्स के एम्पायर पायलट प्रशिक्षण पाठ्यक्रम के लिए चुने गए थे. उस समय उनकी उम्र 19 वर्ष थी. वह 1969 में सेवानिवृत्त हुए थे.
(इनपुट भाषा से)


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