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महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण पर कोर्ट की रोक से सैकड़ों डॉक्टर परेशान

दो मई को सुप्रीम कोर्ट ने मौजूदा सत्र के पीजी में आरक्षण नहीं देने का फैसला किया, इसका असर छात्रों के भविष्य पर पड़ा

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महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण पर कोर्ट की रोक से सैकड़ों डॉक्टर परेशान

प्रतीकात्मक फोटो.

खास बातें

  1. शैक्षणिक सत्र में मराठा आरक्षण लागू नहीं होने से छात्रों को नुकसान
  2. ढाई सौ डॉक्टर कर रहे हैं मुंबई के आजाद मैदान में प्रदर्शन
  3. सुप्रीम कोर्ट ने लगाई मराठा आरक्षण पर रोक
मुंबई:

महाराष्ट्र सरकार की ओर से डेंटल और मेडिकल कॉलेजों में पीजी कोर्स में लागू मराठा आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट की रोक का असर राज्य के सैकड़ों डॉक्टरों पर पड़ रहा है. वे प्रदर्शन करके सरकार की ओर से लागू मराठा आरक्षण पर सवाल उठा रहे हैं.

एक छात्र अजय मोरे ने NDTV से कहा कि 'मुझे जो नौकरी कर अपने परिवार को सुरक्षा देनी थी, वो भी अभी चली गई है. अब मैं जाऊं तो जाऊं कहां? लोगों के फोन मुझे आ रहे हैं, पैसों के लिए.'

महाराष्ट्र के जालना में रहने वाले अजय मोरे अपने गांव के पहले डॉक्टर हैं. उनके पिता किसान हैं और खेती में कोई कमाई नहीं होने के बावजूद अपने बेटे को पढ़ाने के लिए उन्होंने खेत गिरवी रखा. बाद में कई लोगों से पैसे भी लिए. करीब 16 लाख रुपये का कर्ज लेकर उन्होंने अपने बेटे को डॉक्टर बनाया. अजय का पीजी कोर्स में दाखिला भी हो गया, लेकिन मराठा आरक्षण पर लगी सुप्रीम कोर्ट की पाबंदी का असर अब उनकी पढ़ाई पर हो रहा है. वे कर्ज को लेकर चिंतित हैं. अजय मोरे ने कहा कि 'जिस तरह के हालात चल रहे हैं, उससे मुझे नहीं लगता कि मैं यह कर्ज चुका पाऊंगा.'

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अजय जैसे करीब 250 छात्र मुंबई के आजाद मैदान में पिछले एक हफ्ते से प्रदर्शन कर रहे हैं. महाराष्ट्र सरकार ने मराठा आरक्षण में एसईबीसी में शामिल किया है जिसके खिलाफ एक मामला बॉम्बे हाईकोर्ट में भी चल रहा है. अदालत ने इस पर स्टे लगाने से इनकार किया था जिससे छात्रों को मराठा आरक्षण मिला. लेकिन बाद में बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने इस पर स्टे लगा दिया और दो मई को सुप्रीम कोर्ट ने मौजूदा सत्र के पीजी में आरक्षण नहीं देने का फैसला किया. इसका असर छात्रों के भविष्य पर पड़ा है.

पीड़ित डॉक्टर सुरेखा गवाने ने कहा कि 'जब हमारा रिजल्ट आया और इन्होंने आरक्षण की बात कही तो हमें जाति प्रमाण-पत्र सहित कई कागजात जमा करने पड़े. एक महीने में इसे पूरा करना पड़ा. पैसे जमा करने पड़े और अदालत के मामलों में भी पैसे देने पड़े. उसके बावजूद यह हालात हैं. प्राजक्ता पाटिल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तुरंत बाद लोगों को हॉस्टल से भी निकल जाने की बात की गई है. अब यह छात्र क्या करेंगे? यह अलग-अलग जगहों से पढ़ने आए हैं.

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छात्रों ने मुख्यमंत्री से मिलकर हल निकालने को कहा. मुख्यमंत्री ने उन्हें आश्वासन दिया कि न्याय होगा, लेकिन न तो कोई लिखित आश्वासन दिया और न ही कोई समय सीमा बताई. इसलिए अब छात्र सरकार की नीयत पर सवाल उठा रहे हैं. विपक्ष भी इस मामले पर सरकार को घेर रहा है.

महाराष्ट्र कांग्रेस के अध्यक्ष अशोक चव्हाण ने कहा कि 'राज्य में होने वाली इस परेशानी के लिए मुख्यमंत्री जिम्मेदार हैं. केवल आरक्षण की बात की गई है लेकिन बाद में परेशानी होने के बाद असलियत सबको समझ आ गई है.' छात्र हफ्ते भर से प्रदर्शन कर रहे हैं. इस उम्मीद के साथ कि 25 मई तक होने वाली एडमिशन प्रक्रिया से पहले सरकार उनके लिए कोई ठोस कदम उठाएगी.

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चुनाव से पहले मराठा आरक्षण को लागू करके सरकार ने मराठा समाज को अपनी ओर खींचने की कोशिश की, लेकिन चुनाव खत्म होने के तीन दिन बाद रद्द किए गए एडमिशन के कारण अब सरकार की नीयत पर सवाल उठना शुरू हो चुका है. सरकार अब भी उन्हें न्याय देने की बात तो कर रही है लेकिन सरकार की ओर से कदम उठाए जाने तक क्या उनके कॉलेज में सीट बची रहेंगी, यह एक बड़ा सवाल है.



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