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रामनाथ कोविंद क्या तोड़ पाएंगे राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का रिकॉर्ड, पढ़ें- अब तक 6 खास बातें

17 पार्टियों का समर्थन लेकर मैदान में उतरी मीरा कुमार ने आज पत्रकारों से बातचीत में कहा कि वह सैद्धांतिक लड़ाई के लिए उतरी थीं.

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रामनाथ कोविंद क्या तोड़ पाएंगे राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का रिकॉर्ड, पढ़ें- अब तक 6 खास बातें

खास बातें

  1. प्रणब मुखर्जी को मिले थे 69 फीसदी वोट
  2. रामनाथ कोविंद को मिल सकते हैं 70 फीसदी वोट
  3. मीरा कुमार से आगे हैं रामनाथ कोविंद
नई दिल्ली: राष्ट्रपति चुनाव में एनडीए के प्रत्याशी रामनाथ कोविंद की जीत पक्की मानी जा रही है. माना जा रहा है कि 70 फीसदी वोट उनको मिलेंगे. इस लिहाज से वह लोकसभा की पूर्व अध्यक्ष मीरा कुमारपर आसानी से जीत दर्ज कर लेंगे. इसके साथ ही वह वोटों के मामले में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का भी रिकॉर्ड तोड़ सकते हैं. उनको 69 फीसदी वोट मिले थे. आपको बता दें कि लोकसभा और राज्यों की विधानसभा मिलाकर निर्वाचक मंडल के 4,800 सदस्यों ने सोमवार को राष्ट्रपति चुनाव के लिए वोट डाला था. 17 पार्टियों का समर्थन लेकर मैदान में उतरी मीरा कुमार ने आज पत्रकारों से बातचीत में कहा कि वह सैद्धांतिक लड़ाई के लिए उतरी थीं. हम उन मूल्यों के लड़ रहे हैं जिन पर देश की ज्यादातर जनता विश्वास करती है. 

क्या रहीं अभी तक की खास बातें
1- अभी तक मिले परिणामों से साफ जाहिर हो रहा है कि रामनाथ कोविंद ने मीरा कुमार से काफी बढ़त बना ली है. आज सुबह 11 बजे से मतगणना शुरू हो चुकी है और कुल आठ दौर में की जाएगी. 

2- सोमवार को हुई मतदान में 99 फीसदी वोट डाले गए जो अभी तक सबसे ज्यादा वोटिंग परसेंट रहा है. 32 पोलिंग स्टेशनों में वोट डाले गए थे.  दिल्ली में संसद भवन में और बाकी राज्यों की विधानसभाओं में वोट डाले गए. 

3- कुल 4,895 वोटरों में 4,120 विधायक और  776 सांसद शामिल थे. इसमें मध्य प्रदेश के मंत्री नरोत्तम मिश्रा को पेड न्यूज के मामले में दोषी पाए जाने पर मतदान से वंचित कर दिया गया था. 

4- विधायकों के वोटों का मूल्य राज्य की जनसंख्या के हिसाब से तय होता है जबकि सांसदों का एक वोट का मूल्य 708 के बराबर होता है. 

5-  एनडीए की ओर से उम्मीदवार रामनाथ कोविंद बिहार के राज्यपाल रह चुके हैं और दो बार राज्यसभा के सदस्य भी थे. वह हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में वकालत भी कर चुके हैं. 

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6- रामनाथ कोविंद के समर्थन में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी आ गए और इसे विपक्षी एकता के लिए सबसे बड़ा झटका माना गया. जो 2019 में पीएम मोदी के खिलाफ एक बड़ा मोर्चा बनाने का प्लान कर रहा था.  एनडीए की सहयोगी शिवसेना ने भी इस बार अपने गठबंधन के प्रत्याशी का ही समर्थन किया. 

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