NDTV Khabar

लोकसभा चुनाव 2019 : जबलपुर सीट जीतना बीजेपी के लिए नाक का सवाल, कांग्रेस की नजर पुराने गढ़ पर

जबलपुर में छात्र राजनीति से मुख्य धारा की राजनीति में आए शरद यादव ने 1974 में रोक दिया था कांग्रेस की जीत का रथ

 Share
ईमेल करें
टिप्पणियां
लोकसभा चुनाव 2019 : जबलपुर सीट जीतना बीजेपी के लिए नाक का सवाल, कांग्रेस की नजर पुराने गढ़ पर

जबलपुर में लोकसभा चुनाव में प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष राकेश सिंह के खिलाफ कांग्रेस किसे प्रत्याशी बनाती है, यह बड़ा सवाल है.

खास बातें

  1. प्रदेश बीजेपी के अध्यक्ष राकेश सिंह 2004 से जीत रहे चुनाव
  2. जबलपुर सीट पर पिछले 23 साल से बीजेपी का कब्जा
  3. कांग्रेस के सेठ गोविंद दास लगातार पांच चुनाव जीते थे
नई दिल्ली:

मध्यप्रदेश की जबलपुर लोकसभा सीट राज्य की सबसे महत्वपूर्ण सीटों में शामिल है. इसके पीछे कारण यह है कि जबलपुर दक्षिण-पूर्व मध्यप्रदेश के महाकौशल क्षेत्र की राजनीति का केंद्र है. यह सीट बीजेपी का गढ़ है जहां उसे 23 साल से कोई नहीं डिगा पाया. यहां बीजेपी सन 1996 से लगातार जीत रही है. बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह सन 2004 से यहां के सांसद हैं. उन्होंने हर बार पहले से अधिक वोटों से जीत हासिल की है. पहले कांग्रेस का गढ़ रही जबलपुर सीट को फिर से हासिल करना कांग्रेस की बड़ी ख्वाहिश हो सकती है.       

जबलपुर लोकसभ क्षेत्र में जहां पहले बदलाव की प्रवृत्ति रही है वहीं 1996 के बाद से इस प्रवृत्ति में बदलाव आया. पिछले 23 साल से यहां के मतदाता निरंतर बीजेपी को जीत का सेहरा पहनाते आ रहे हैं. आजादी के बाद 1951 से लेकर 1974 तक इस सीट पर कांग्रेस परचम लहराती रही. इसके बाद यहां के मतदाता निरंतर बदलाव करते रहे. लेकिन 1996 से जबलपुर के मतदाताओं ने बदलाव पसंद नहीं किया.      

आगामी चुनाव में बीजेपी के लिए यह सीट कहीं ज्यादा अहम है क्योंकि यहां से उसके प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह का चुनाव लड़ना तय है. चूंकि प्रदेश अध्यक्ष की सीट है इसलिए यहां जीतना बीजेपी की नाक का सवाल है. इसके अलावा उसके लिए अपने 23 साल पुराने गढ़ को बचाने की भी चुनौती है. कांग्रेस के लिए अपने पुराने गढ़ को फिर से हासिल करने की चुनौती है. कांग्रेस राकेश सिंह के सामने किसे प्रत्याशी बनाती है, यह बड़ा सवाल है.     


मध्यप्रदेश की संस्कारधानी कहलाने वाले जबलपुर में बीजेपी की जड़ें गहरी जमी हैं. महाकौशल क्षेत्र का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्यालय भी जबलपुर में है. पिछले छह चुनावों में बीजेपी ने यहां जीत हासिल की है. इस सीट पर कांग्रेस अंतिम बार सन 1991 में जीती थी. जबलपुर में अब तक हुए लोकसभा चुनावों में बीजेपी को आठ चुनावों में और कांग्रेस को सात चुनावों में विजय मिली.

यह भी पढ़ें : लोकसभा चुनाव 2019 : मध्यप्रदेश की विदिशा सीट पर क्यों टिकीं सबकी नजरें

पहली लोकसभा के चुनाव के दौरान जबलपुर में दो सीटें थीं. सन 1951 में हुए चुनाव में जबलपुर उत्तर सीट से कांग्रेस के सुशील कुमार पटैरिया जीते थे और मंडला-जबलपुर दक्षिण सीट से पहले मंगरु गुरु उइके सांसद बने. इस सीट पर बाद में हुए उपचुनाव में सेठ गोविंद दास चुने गए. सन 1957 में जबलपुर और मंडला दो अलग-अलग संसदीय क्षेत्र बन गए. इस साल दूसरी लोकसभा के लिए हुए चुनाव में कांग्रेस के सेठ गोविंद दास जीते. इसके बाद सेठ गोविंद दास का जीत का सिलसिला चलता रहा. उन्होंने 1962, 1967 और 1971 के चुनाव भी जीते.     

साल 1974 जबलपुर सीट पर बदलाव का साल रहा. जबलपुर में छात्र राजनीति में सक्रिय रहे शरद यादव इस साल मुख्य धारा की राजनीति में कूद पड़े. वे जयप्रकाश नारायण के विद्यार्थी आंदोलन से जुड़े थे और छात्र राजनीति के दौरान उन्होंने जबलपुर क्षेत्र में अपना जनाधार भी बना लिया था. उस दौर में कांग्रेस के खिलाफ एक लहर भी बन गई थी. सेठ गोविंद दास उद्योगपति थे जबकि शरद यादव आम जनता के बीच का चेहरा था. हालांकि इस बार सेठ गोविंद दास चुनाव मैदान में नहीं थे. भारतीय लोक दल के टिकट पर चुनाव लड़े शरद यादव ने कांग्रेस के जगदीश नारायण अवस्थी को पराजित कर दिया. उन्होंने कांग्रेस का गढ़ ढहा डाला. आपातकाल के बाद सन 1977 में हुए चुनाव में एक बार फिर शरद यादव जीते.  

यह भी पढ़ें : लोकसभा चुनाव : बीजेपी सांसद शत्रुघ्न सिन्हा की सीट पटना साहिब में होगा इस बार दिलचस्प मुकाबला

सातवीं लोकसभा के लिए 1980 में हुए चुनाव में जबलपुर के मतदाताओं ने फिर बदलाव को अंजाम दिया. कांग्रेस के मुंदर शर्मा सांसद बने. बाद में उपचुनाव हुआ तो यह सीट बीजेपी ने कांग्रेस से छीन ली. कांग्रेस के बाबूराव परांजपे को विजय हासिल हुई. आठवीं लोकसभा के लिए 1984 में कांग्रेस के अजयनारयण मुशरान विजयी हुए और 1989 में एक बार फिर बीजेपी के बाबूराव परांजपे चुने गए. सन 1991 में कांग्रेस के श्रवण कुमार पटेल सांसद चुने गए.  

ग्यारहवीं लोकसभा के लिए 1996 में हुए चुनाव के साथ जबलपुर सीट पर बदलाव का सिलसिला थम गया. बीजेपी के बाबूराव परांजपे ने जीत हासिल की. 1998 में भी परांजपे जीते. सन 1999 में  बीजेपी की जयश्री बनर्जी जीतीं. सन 2004 में बीजेपी के राकेश सिंह जीते. इसके बाद उनकी जीत का क्रम रुका नहीं. वे 2009 और 2014 की चुनाव भी जीते.  

यह भी पढ़ें : इस नेता के नाम है लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ी जीत, तोड़ चुकी हैं पीएम मोदी का रिकॉर्ड

जबलपुर के मौजूदा सांसद राकेश सिंह 56 साल के हैं और राज्य बीजेपी के अध्यक्ष भी हैं. राकेश सिंह ने अपने पिछले कार्यकाल के दौरान महाकौशल क्षेत्र में खास तौर पर रेलवे सुविधाओं में इजाफे के लिए काफी काम किया है. साल 2014 के लोकसभा चुनाव में राकेश सिंह को 5,64,609 वोट मिले थे जो कि 56.34 फीसदी थे. उनके खिलाफ कांग्रेस के प्रत्याशी वरिष्ठ वकील विवेक तन्खा को 3,55,970 यानी कि 35.52 प्रतिशत वोट मिले थे. मतदान 10,02,184 वोटरों ने किया था जो कि 58.55 फीसदी था. इससे पहले 2009 के चुनाव में राकेश सिंह को 3,43,922 वोट मिले थे जो कि 54.29 प्रतिशत थे. उनके खिलाफ चुनाव लड़े कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रामेश्वर नीखरा को 2,37,919 वोट मिले थे जो कि कुल मतदान का 37.56 प्रतिशत थे. साल 2009 में मतदान 6,33,493 लोगों ने किया था जिसका प्रतिशत    43.80 था.    

यह भी पढ़ें : 62 साल से चुनाव हारते आ रहे हैं श्याम बाबू, 2019 में भी जीतने के लिए आजमाएंगे किस्मत

जबलपुर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत विधानसभा की आठ सीटें हैं- पाटन, जबलपुर उत्तर, पनागर, बरगी, जबलपुर कैंट, सिहोरा, जबलपुर पूर्व और जबलपुर पश्चिम. इनमें से चार पर कांग्रेस और चार पर बीजेपी काबिज है.

टिप्पणियां

यह भी पढ़ें : दिल्ली : केजरीवाल की गठबंधन की मनुहार को चुनावी हथियार बनाएगी बीजेपी

सन 2011 की जनगणना के अनुसार जबलपुर की जनसंख्या जबलपुर की जनसंख्‍या 24 लाख 60 हजार 714 है. यहां 59.74 प्रतिशत आबादी शहरी और 40.26 प्रतिशत आबादी ग्रामीण है. विधानसभा चुनाव 2018 के दौरान जारी की गई पुनरीक्षित मतदाता सूची के मुताबिक इस क्षेत्र में कुल मतदाता 17 लाख 63 हजार 520 है. इनमें से आठ लाख 49 हजार 848 महिला मतदाता हैं.



Hindi News से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक पर लाइक और ट्विटर पर फॉलो करें.


Advertisement