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नौकरियों पर सीरीज़ (एपिसोड 11) : नतीजों के लिए लंबा इंतज़ार क्यों?

नतीजों के लिए लंबा इंतज़ार क्यों, भर्ती प्रक्रिया के लिए तय समय सीमा क्यों नहीं? सफल उम्मीदवारों में नाम, फिर भी क्यों डरते हैं युवा?

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नौकरियों पर सीरीज़ (एपिसोड 11) : नतीजों के लिए लंबा इंतज़ार क्यों?
नौकरी सीरीज़ का हमारा ग्यारहवां एपिसोड जारी है. स्टाफ सलेक्शन कमीशन ने कहा है कि करीब 15 हज़ार नौजवानों को 28 फरवरी तक केंद्र के अलग-अलग विभागों में ज्वाइनिंग हो जाएगी. ये वे नौजवान हैं जिन्होंने स्टाफ सलेक्शन कमीशन 2015 बैच की परीक्षा अंतिम रूप से पास कर ली है. इनका रिज़ल्ट अगस्त 2017 में ही आ गया है फिर भी अभी तक ज्वाइनिंग नहीं हुई है. कई विभाग छात्रों को बता ही नहीं रहे हैं कि आपकी ज्वाइनिंग कब होगी, लिहाज़ा परेशान हैं. सीएजी हो, सूचना प्रसारण मंत्रालय हो या कृषि मंत्रालय हो, हमारी सीरीज़ के बाद एसएससी के चेयरमैन असीम खुराना ने अपनी वेबसाइट पर पत्र प्रकाशित किया है कि 28 फरवरी तक सबकी ज्वाइनिंग हो जाएगी. उन्होंने एक पत्र में बताया है कि पोस्टल विभाग के लिए चुने गए 5205 छात्रों को पत्र मिल जाएगा. इसके लिए सभी 13 पोस्टल सर्किल को आदेश चले गए हैं. बंगाल सर्किल ने अपनी वेबसाइट पर 398 नौजवानों की पोस्टिंग का ऐलान भी कर दिया है जबकि 12 जनवरी को आदेश गया था कि इनकी नियुक्ति पर रोक लगाई जाए. नौजवानों का कहना है कि ऐसी ही रोक अन्य विभागों में लगाई गई थी. जो हम अपनी तरफ से कन्फर्म नहीं कर सकते, लेकिन इतनी देरी से छात्र बहुत परेशान हैं.

एसएससी के चेयरमैन ने एक फरवरी 2018 को वेबसाइट पर जो पत्र डाला है उसमें सीएचएसए 2015, सीएचएसएल 2016 और सीजीएल 2016 के बारे में लिखा गया है. सीएचएसएल 2015 में 9194 छात्र पास कर ज्वाइनिंग का इंतज़ार कर रहे हैं. सीजीएल 2016 में 10,661 नौजवान पास होकर ज्वाइनिंग का इंतज़ार अगस्त 2017 से ही कर रहे हैं. चेयरमैन ने अलग-अलग विभागों से कहा है कि दोनों बैच, यानी 19,855 नौजवानों को फरवरी के महीने में ही ज्वाइन लेटर दे दिया जाए. इस पत्र में यह भी कहा है कि सीएचएसएल 2016 की परीक्षा का रिज़ल्ट भी 16 फरवरी को आ जाएगा. 6,700 नियुक्तियों के लिए नतीजे आने बाकी हैं. इसके बाद भी छात्र जब अलग-अलग विभागों में फोन कर रहे हैं तो उन्हें निराशा हाथ लग रही है. खासकर फिल्म डिवीज़न के लिए चुने गए 29 नौजवानों को लग रहा है कि कहीं वहां पर पोस्ट ही खत्म न हो जाए और उनका रिज़ल्ट खत्म न हो जाए. सीएजी के लिए जिन छात्रों का चयन हुआ था, वे काफी परेशान थे. मुझे तो यह भी पता चला कि रिश्ते की बात हो रही है, होने वाली है मगर ज्वाइनिंग हो तब तो आगे बढ़े कोई. प्राइम टाइम टीवी का काम हिन्दू-मुस्लिम टापिक दिखाकर देश उजाड़ने की जगह घर बसाने में हो जाए तो मज़ा आ जाए. सीएजी के छात्रों के लिए खुशी की बात है मगर मैं अभी रसगुल्ला नहीं खाने वाला. वज़न बढ़ गया है. सीएजी ने भी अपनी वेबसाइट पर एक सूचना प्रकाशित कर दिया है.

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कम्बाइंड हायर सेकेंडरी लेवल एग्ज़ामिनेशन 2015 के ज़रिए डेटा एंट्री ऑपरेटर की नियुक्ति के लिए जिन उम्मीदवारों का चयन हुआ है, उनके राज्य और कार्यालय का बंटवारा या आवंटन, इस शीर्षक के नीचे लिखा है कि स्टाफ सलेक्शन कमीशन ने 999 उम्मीदवारों को नॉमिनेट किया है. मेरिट के आधार पर इनके स्टेट और कार्यालय का आवंटन हो गया है. जो उम्मीदवार ऑनलाइन सूचना जमा कर सके हैं उन्हें जनरल पूल के तहत आवंटन किया गया है. राज्य और कार्यालय का बंटवारा अंतिम है. इसमें बदलाव की गुज़ारिश स्वीकार नहीं की जाएगी. जिन दफ्तरों के लिए उम्मीदवारों का चयन हुआ है, वहां पर उनके डोज़ियर भेजे जा रहे हैं ताकि वहां से नियुक्ति पत्र जारी हो सके.

999 नौजवानों की ज़िंदगी में आज रंग आ गया है. वे आज की रात खुशी के मारे सो नहीं पाएंगे. उनके रिश्तेदार कितने खुश होंगे. हम इस खुशी में उनसे यही कहते हैं कि हिन्दू-मुस्लिम टापिक पर डिबेट पूरे देश में बंद होना चाहिए. टीवी पर जब भी टापिक देखें केबल वाले को फोन कर कनेक्शन कटवा दें, आपका कुछ नहीं बिगड़ेगा. सीएजी की साइट से हमें पता चला है कि फिरोज़ अहमद को हिमाचल प्रदेश, अखिलेश नामदेव को मध्यप्रदेश मिला है, निखिल यादव को यूपी मिला है, पूजा शर्मा को दिल्ली मिला, प्रवीण को हरियाणा मिला, रोहित को बंगाल, शैलेश मौर्या को यूपी, राकेश कुमार को बिहार, विनीत कश्यप को झारखंड, मनोज कुमार शर्मा को गुजरात, हिमानी अनेजा को पंजाब, ज्योति को हरियाणा, मोहम्मद अज़हरुद्दीन कोआंध्र प्रदेश मिला है. आप सभी को बधाई. इन नामों को पढ़ते हुए लग रहा है विविध भारती के लिए झुमरी तलैया से आए नामों को पढ़ रहा हूं.

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ग्यारहवें एपिसोड तक आते-आते हमें पता नहीं था कि ऐसा हो जाएगा. प्लीज़ मेरे लिए कोई मिठाई नहीं भेजेगा. कभी मिलना तो गले मिलना दोस्तो. अब दूसरी कहानी बताता हूं. एक अप्रैल 2017 को सेंट्रल बैंक आफ इंडिया के लिए 800 से अधिक उम्मीदवार अलग-अलग पदों के लिए चुने गए. इनमें से कई सौ उम्मीदवारों की ज्वाइनिंग नहीं हो रही है. 31 मार्च तक नहीं हुई तो इनका रिज़ल्ट रद्द हो जाएगा. एक-एक दिन इन पर भारी पड़ रहा है. हमने नौकरी सीरीज़ में इसका ज़िक्र किया था. शुक्र है किसी ने सेट्रल बैंक ऑफ इंडिया में इन नौजवानों की पुकार सुनी है. आज इसकी वेबसाइट पर एक नोटिस ने 700 से अधिक नौजवानों को उम्मीदों से लबालब कर दिया. यह सूचना सेंट्रल बैंक आफ इंडिया की वेबसाइट पर भी है. इसमें लिखा है कि 2017-18 में आईबीपीएस के द्वारा अलग-अलग कैटेगरी में जितने उम्मीदवार दिए गए थे हमने ज़्यादातर को नियुक्ति पत्र दे दिए हैं. जहां तक बाकी बचे उम्मीदवारों का सवाल है, हम यह बताना चाहते हैं कि उनकी ज्वाइनिंग की तारीख़ के संदर्भ में जल्दी ही नोटिफिकेशन आ जाएगा.

छात्रों ने बताया कि 50 पीओ, 100 एग्रीकल्चर फील्ड अफसर और 542 क्लर्क नियुक्ति पत्र का इंतज़ार कर रहे हैं. बैंक से संपर्क करने का प्रयास किया मगर, असफल रहे. हमने वैसे पहले भी मेसेज किया था कि बात करना चाहते हैं. पर कोई बात नहीं, इन्हें ज्वाइनिंग लेटर मिल जाए, वह ज़्यादा ज़रूरी है, कौन बात करता है, कौन नहीं करता है, ये बिल्कुल ज़रूरी नहीं है. इतने भर की नोटिस देखकर छात्र भावुक हो गए. मगर अब भी सतर्क हैं कि वाकई ज्वाइनिंग लेटर मिलेगा या नहीं. मुझे लगता है कि मिल जाएगा. चयन आयोगों को बदलना तो पड़ेगा ही. छात्रों में जागरूकता फैल रही है. अब जब वे आंदोलन कर रहे हैं तो पता है कि किसे तस्वीर भेजनी है. आईटी सेल ने मेरा नंबर जन-जन तक पहुंचा दिया, जन-जन ने मुझ तक अपनी बात पहुंचा दी. जब सारा देश बजट की चिंता में डूबा था, बिहार के आरा में छात्र रोज़गार के सवाल को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दहेज़ के खिलाफ मानव श्रृंखला क्या बनवाई, अब जनता भी मानव श्रृंखला बनाकर उन तक अपनी बात पहुंचाने लगी है. इसे कहते हैं रेसिप्रोकल कम्युनिकेशन. स्टेट जिस भाषा में लोगों से संवाद करना चाहता है, लोग भी स्टेट से उसी भाषा में संवाद करने लगते हैं.

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मानव श्रृंखला की कतार बता रही है कि बेरोज़गारी के सवाल पर नौजवानों ने एक-दूसरे का हाथ थामना शुरू कर दिया है. आरा मेरा प्यारा शहर है. इस शहर में बिहार चुनाव के दौरान मैंने देखा था लड़के तालाब के किनारे, खंडहर इमारतों के पीछे पढ़ रहे हैं, कॉम्पटीशन की तैयारी कर रहे हैं. मैंने किसी भी शहर में ऐसा दृश्य नहीं देखा है. वाकई आरा के लड़के अच्छे होंगे. इन छात्रों का कहना है कि नौकरियां कम हो रही हैं. रेलवे की तैयारी खूब करते हैं मगर रेलवे में नौकरियां नहीं आ रही हैं. प्राइम टाइम का असर होगा और रेलवे में भी नौकरियां आएंगी. वरना 28 फरवरी की जगह 28 मार्च तक नौकरियों पर ये सीरीज़ करूंगा. वैसे ये छात्र राज्य सरकार से भी दुखी हैं. उनका कहना है कि मुख्यमंत्री अगर बेरोज़गारी पर मानव श्रृंखला बनवाते तो विश्व रिकॉर्ड कायम हो जाता. युवाओं ने मार्च भी निकाला है. स्थानीय अखबारों में हल्के-फुल्के तरीके से छपा है. नौजवानों को यह भी देखना है कि सत्ता से डरे हिंदी के अखबारों में उनकी आवाज़ को कहां जगह मिलती है. इन तख्तियों पर लिखा है, रेलवे में बहाली जल्दी दो, हम चाय-पकौड़े नहीं बेचेंगे... बेरोजगारी के खिलाफ युवा बेरोजगार शृंखला, शिक्षा व्यवस्था में सुधार करो, शिक्षकों के रिक्त पदों पर बहाली जल्दी करो, BSSC की परीक्षा जल्दी हो, CGL 2016 को जल्दी क्लियर करो...

पूरे भोजपुर जिले के जितने भी युवा बेरोजगार साथी हैं वे सारे लोग आज केंद्र सरकार के खिलाफ और राज्य सरकार के खिलाफ सड़क पर आए हुए हैं और जो बजट पास हुआ है सरकार का उसमें हमारे युवाओं के हित के प्रति कोई भी ध्यान नहीं दिया गया है. उसके खिलाफ सारे युवा बेरोजगार रोड पर आए हैं. सरकार ने जितनी भी वैकेंसियां हैं, सबको रोककर रखा हुआ है. हमने नौकरियों पर अपने सातवें एपिसोड में उत्तर प्रदेश के बीटीसी पात्रता वाले नौजवानों का हाल बताया था. इन नौजवानों का दर्द भयावह है. 2016 में 12, 460 पदों के लिए विज्ञापन निकला था. मार्च 2017 तक काउंसलिंग की प्रक्रिया चली है. 18 मार्च को सारे ज़िले के कट आफ गए और मेरिट लिस्ट बन गई थी. लेकिन 23 मार्च को योगी सरकार ने इन भर्तियों पर रोक लगा दी. उसके बाद से ये नौजवान हर मौके पर प्रदर्शन कर रहे हैं. यहां तक कि 16 जुलाई 2017 से तीन सितंबर 2017 तक ढाई महीने लखनऊ के लक्ष्मण मेला मैदान में धरना भी दिया.

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अब ये परीक्षार्थी अदालत जा चुके हैं. हाईकोर्ट से केस भी जीत गए . 3 नवंबर को अदालत ने सरकार को आदेश दिया कि दो महीने में इनको बहाल किया जाए. अदालत के आदेश के बाद भी दो महीने बीत गए हैं और इन छात्रों को पता नहीं कि क्या होगा. सरकार अब सिंगल बेंच के आदेश के खिलाफ डिवीजन बेंच में चली गई. अब खबर यह है कि हाईकोर्ट में चार दिनों तक लगातार सुनवाई चली है. जस्टिस तरुण अग्रवाल की बेंच ने सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित कर लिया है. सोमवार को फैसला आने की उम्मीद है. अब बस चंद दिनों में 12, 460 नौजवानों की ज़िंदगी का फैसला हो जाएगा. इन्हें काफी पापड़ बेलने पड़े हैं, उम्मीद है कुछ अच्छा होगा. छात्रों की तरह मुझे भी उम्मीद है कि फैसले के बाद लड्डू बंटेंगे, आंसू नहीं गिरेंगे मगर अदालत के फैसले का इंतज़ार इस तरह नहीं करना चाहिए. फैसला कानून और तथ्यों के आधार पर ही आएगा, उम्मीदों और सपनों के हिसाब से नहीं. जो लड़ता है, अंत में जीत जाता है.

हम यूपी के शिक्षा मित्रों की तकलीफ से अवगत हैं. पहले भी उनकी बात की है, आगे भी करेंगे. यूपी पुलिस भरती और प्रोन्नति बोर्ड ने जब से लिपिक, कंप्यूटर आपरेटर की परीक्षा रद्द कर दी है, नौजवान बहुत निराश हैं. किसी नेता को टाइम निकालकर इनसे बात करनी चाहिए, नौजवानों को भी निराश नहीं होना चाहिए. आप तब तक देखिए कि कौन सा हिन्दी का अखबार आपकी समस्या को जगह दे रहा है, किस तरह से दे रहा है. क्योंकि स्थानीय रूप से आपके करीब वही हैं. हम लोग तो बहुत दूर हो गए हैं. अब आते हैं मिडिल क्लास पर. नौकरी सीरीज़ हमारी यूनिवर्सिटी सीरीज़ से अपने आप जुड़ जाती है. नौजवान एक बार सोचें कि जिस कालेज में गए क्या वहां टीचर था, टीचर ने ठीक से पढ़ाया, वह यह भी सोचें कि क्या वे मन से क्लास करने गए, ये सब सवाल सोचें.

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मैं मिडिल क्लास की बात क्यों करना चाहता हूं. एक अरब 25 करोड़ की आबादी में आठ करोड़ लोग टैक्स देते हैं. अगर आप इसे ही मिडिल क्लास मान लें तो यह कितना कम है. यह सिर्फ टीवी और ट्वीटर पर ज़्यादा दिखता है, नेता के खिलाफ माहौल बनाने में ,और टैक्स लाभ नहीं मिला तो मज़ाक उड़ाने में. मिडिल क्लास की हालत ऐसी इसलिए हो रही है क्योंकि वह अपने हितों को ठीक से नहीं समझता. उसे टैक्स और कैपिटेल गेन्स से बाहर आकर भारत को देखना होगा. क्या मिडिल क्लास को पता है कि अपने जिन बच्चों के लिए वह सुबह छह बजे उठकर बस स्टाप जाता है, वो जब स्कूल से निकलेंगे तो उनके लिए किस लेवल का कालेज मौजूद है. जब हम यूनिवर्सिटी सीरीज़ कर रहे थे तब हर दूसरे शहर के कालेज का हाल देखा, यूनिवर्सिटी का हाल देखा.. जैसे दस हज़ार लड़कियां पढ़ रही हैं, मगर पढ़ाने के लिए शिक्षक नहीं हैं. ठेके पर शिक्षक रखे गए हैं मगर उन्हें सैलरी नहीं मिल रही है. उनकी अपनी ज़िंदगी का पता नहीं है. अगर आपको लगता है कि हम दिल्ली-मुंबई में रहते हैं तो यहां के विश्वविद्यालयों की हालत बहुत ख़राब है. बिना योग्य शिक्षक के क्लास रूम में आप अपने उस बच्चे को तीन साल के लिए भेज देते हैं जिसके नर्सरी में एडमिशन के लिए आप स्कूल के बाहर रात भर खड़े रहते हैं ताकि एक फार्म ख़रीद सकें. आप चाहें तो यू ट्‌यूब में जाकर 27-27 की सीरीज़ देख सकते हैं.

VIDEO: पास हो चुके हजारों युवक ज्वाइनिंग के इंतजार में
आप चाहें तो मैं आपको भारत के किसी भी शहर में ले जाकर कालेजों का यह हाल दिखा सकता है. आप अपनी राजनीतिक पसंद के हिसाब से भी शहर का चुनाव कर सकते हैं खासकर उन मुख्यमंत्रियों के राज्य में जहां वे 10-15 साल से सत्ता में हैं. इतना वक्त काफी होता है ख़ाली ज़मीन में एक शहर बना देने के लिए और बन भी रहा है.  बिना समझे आप समझ सकेंगे कि किस तरह मिडिल क्लास के बच्चों का भविष्य बर्बाद करने के लिए इन कालेजों को कबाड़ की तरह रखा गया है. इन्हें कबाड़ में बदला गया है. कबाड़ इसलिए कह रहा हूं कि वाकई ये कबाड़ ही हैं. मिडिल क्लास को सरकार ने नहीं, उसने खुद को निराश किया है. इंग्लिश में लेट डाउन किया है.  बिहार के बेगुसराय में श्रीकृष्ण महिला कालेज है. इस कालेज में 8500 लड़कियां पढ़ती हैं. पढ़ाने के लिए मात्र 9 शिक्षक हैं. एक टीचर पर करीब 900 से अधिक छात्राएं आ जाती हैं. अब अगर आप गणित में कभी पास नहीं भी हुए होंगे तो भी यह समझ सकते हैं कि इस तरह के अनेक कालेजों में पढ़ने की चाह से आने वाली लड़कियों का भविष्य किस तरह बर्बाद किया जा रहा है. सिर्फ इंडिया का मिडिल क्लास ऐसा है जिसे अपनी बर्बादी का पता नहीं चलता है.


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