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बेंगलुरु के हलाल घोटाले में दस्तावेज से हुआ नया खुलासा, RBI की चेतावनी पर भी चुप बैठी रहीं सरकारें

आईएमए नाम की कंपनी द्वारा किए गए घोटाले के शिकार हुए सैकड़ों लोगों ने 'हलाल की कमाई' के फेर में अपनी जीवन भर की कमाई खो दी

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बेंगलुरु के हलाल घोटाले में दस्तावेज से हुआ नया खुलासा, RBI की चेतावनी पर भी चुप बैठी रहीं सरकारें

बेंगलुरु में हलाल घोटाले के शिकार हुए सैकड़ों लोगों ने अपनी जमा पूंजी गंवा दी और कर्ज में भी दब गए.

खास बातें

  1. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने 2017 में कर्नाटक सरकार को चेतावनी दी थी
  2. आईएमए सहित कई फर्जी कंपनियों पर कार्रवाई की सिफारिश की थी
  3. सिद्धरमैया और कुमारस्वामी की सरकारों ने चेतावनी को नजरअंदाज किया
बेंगलुरु:

कर्नाटक के बेंगलुरु में मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाते हुए एक बड़े घोटाले को अंजाम दे दिया गया. इस अरबों रुपये के हलाल घोटाले से पहले ही इसके बारे में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने कर्नाटक सरकार को चेताया लेकिन पूर्व की सिद्धरमैया सरकार और मौजूदा कुमारस्वामी सरकार ने इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं की. नतीजा सामने है...घोटाले के शिकार हुए सैकड़ों लोगों ने अपनी जीवन भर की कमाई खो दी. 'हलाल की कमाई' के फेर में अपनी जमा पूंजी गंवा दी. घोटालेबाजों ने मुस्लिम समुदाय को उसकी धार्मिक मान्यता का फायदा उठाकर शिकार बनाया.       

बेंगलुरु में हुए अरबों रुपये के हलाल घोटाले से जुड़े जो दस्तावेज़ सामने आए हैं उनसे पता चलता है कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने 2017 में सरकार से आईएमए सहित आधा दर्जन फर्जी कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की थी ताकि धोखाधड़ी को रोक जा सके, लेकिन इसके बावजूद सिद्धरमैया सरकार ने इसे नजरअंदाज किया. बाद में मौजूदा कुमारस्वामी सरकार ने भी इसे अनदेखा कर दिया.


दस्तावेज में आरबीआई की सलाहकार समिति की सिफारिश में साफ कहा गया है कि आईएमए एमबीडैंट के साथ-साथ कई अन्य कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए ताकि धोखाधड़ी से बचा जा सके. लेकिन तब के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया और बाद में कुमारस्वामी ने इन कंपनियों के खिलाफ जरूरी कदम नहीं उठाए, और नतीजा सामने है. कुल मिलकर तकरीबन 15 हजार करोड़ रुपये का घोटाला हो गया. इसमें आम लोग हलाल कमाई के नाम पर बरबाद हो गए.

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राज्यसभा के पूर्व डिप्टी चेयरमैन रहमान खान ने इस मामले को लेकर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि "आरबीआई के निर्देश के बावजूद सरकार चुप क्यों रही? पुलिस ने कार्रवाई क्यों नहीं की. दो साल तक यह लोग क्या कर रहे थे? आयकर विभाग के छापे के बावजूद आईएमए अपना धंधा कैसे करता रहा?

आईएमए ने एक लाख रुपये के बदले हर महीने तीन हजार रुपये देने का वादा किया था. मौलवी और आलिमों से इसको जायज़ ठहरवाया गया. नतीजा यह हुआ कि किसी ने घर और जेवर गिरवी रखकर पैसे दिए तो किसी ने पेंशन की सारी रकम इसमें लगा दी. आईएमए का मालिक मंसूर खान पर निवेशकों का पैसा लेकर भागने का आरोप है. वह कहां है, किसी को पता नहीं है.

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दरअसल 2018 में राज्य सरकार ने इन कंपनियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई के लिए नोटिस तो जारी किए लेकिन यह सिर्फ कागजों तक ही सीमित रहा. इस्लाम में ब्याज लेना या देना हराम है, इसलिए मुसलमान बैंकों में पैसा रखना नहीं चाहते. इसी का फायदा इस्लामिक बिजनेस मॉड्यूल के नाम पर  धोखाधड़ी करने वाले उठाते हैं.

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अब तस्वीर बिलकुल साफ है, अरबों रुपये की इस धोखाधड़ी की जानकारी सरकार को थी. अरबीआई ने चेतावनी भी दी, लेकिन इसके बावजूद तब के मुख्यमंत्री सिद्धारमैय्या और मौजूद कुमारस्वामी ने आईएमए घोटाले को  रोकने की कोशिश नहीं की. यानी हुकूमत, इस्लामिक धर्म गुरू, राजनेताओं, सभी ने मिलकर इस धोखाधड़ी को अंजाम दिया... ऐसा कहना शायद गलत नहीं होगा.



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