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दिल्ली के मुख्यमंत्री या स्वास्थ्य मंत्री इस बच्चे के लिए अस्पताल में एक बेड मुहैया करा पाएंगे?

सरकारी अस्पतालों की हालात कितनी अच्छी है यह कहने की जरुरत नहीं हैं. कुछ अस्पताल तो ठीक-ठाक हैं. जहां सही इलाज होता है लेकिन वहां भीड़ इतनी है कि इलाज करा पाना आसान नहीं है.

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दिल्ली के मुख्यमंत्री या स्वास्थ्य मंत्री इस बच्चे के लिए अस्पताल में एक बेड मुहैया करा पाएंगे?
नई दिल्ली:

सरकारी अस्पतालों की हालात कितनी अच्छी है यह कहने की जरुरत नहीं हैं. कुछ अस्पताल तो ठीक-ठाक हैं. जहां सही इलाज होता है लेकिन वहां भीड़ इतनी है कि इलाज करा पाना आसान नहीं है. कभी इलाज हो पाता है तो कभी नहीं. उत्तर प्रदेश के मैनपुरी के प्रदीप पिछले 45 दिनों से अपने 18 महीने के बच्चे को लेकर एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल भाग रहे हैं लेकिन उनके बेटे का इलाज नहीं हो पा रहा है. हर जगह उन्हें निराश होना पड़ रहा है. कहीं डॉक्टर नहीं है तो कहीं बेड खाली नहीं है. अगर किसी सरकारी अस्पताल में 45 दिनों तक बेड खाली नहीं होता है तो फिर यह चिंता की बात है. प्रदीप के बेटे के सिर में पानी है, जिस का असर पूरे शरीर पर होने लगा है. 

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एक दिन अचानक प्रदीप के बेटे को बुखार आया. दवाई खाने के बाद बुखार ठीक तो हुआ लेकिन कुछ दिन के बाद एक पैर ने काम करना बंद कर दिया. प्रदीप जब डॉक्टर के पास गए  तो डॉक्टर अल्ट्रा साउंड करने के लिए कहा. सिर के अल्ट्रासाउंड से पता चलता है की प्रदीप के बेटे सिर में पानी है जिस का असर पूरे बदन पर हो रहा है. फिर उन्हें आगरा या दिल्ली में इलाज कराने के लिए कहा गया. आगरा में ट्रीटमेंट करना प्रदीप के लिए संभव नहीं था इसलिए वह दिल्ली आ जाते हैं ताकि किसी न किसी सरकारी अस्पताल में उनके बेटे का इलाज हो जाए. 

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सबसे पहले प्रदीप दीन दयाल अस्पताल पहुंचे. 23 अगस्त को प्रदीप के बेटे को एडमिट किया गया.  28 अगस्त को अचानक प्रदीप को कहा जाता है की वो अपने बेटे को लेकर जीबी पंत अस्पताल चले जाएं और वहां  एडमिट करवा लें. क्योंकि यहां उनकी बेटे की इलाज संभव नहीं है, प्रदीप दिल्ली में नए है उन्हें जीबी पंत अस्पताल के बारे में कुछ पता नहीं था. उन्हें यह भी पता नहीं था जीबी पंत अस्पताल कहां है. प्रदीप रात भर दीनदयाल अस्पताल के बाहर समय काटते रहे और अगले दिन अस्पताल पहुंचे. जब वह अपने बेटे के साथ जीबी पंत अस्पताल पहुंचे तो उन्हें पता चला कि अस्पताल में पर्चा बनना बंद हो गया. जिसकी वजह से उन्हें फिर रात जीबी पंत अस्पताल के बाहर रात गुजारनी पड़ी. 

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अगली सुबह प्रदीप ने पर्चा तो बनवा लिया लेकिन उनके बेटे को अस्पताल में एडमिट नहीं किया जा सका. क्योंकि अस्पताल में कोई बेड ही खाली नहीं था. करीब 15 दिन तक प्रदीप अस्पताल के बाहर इस उम्मीद के साथ सोते रहे कि उनका नंबर आ जाए और उन्हें बेड मिल जाए. एक महीने तक भागदौड़ करने के बावजूद जीबी पंत में प्रदीप के बेटे को बेड नहीं मिल सका. अस्पताल के तरफ से कहा गया कि बेड खाली ही नहीं है. प्रदीप को बताया गया कि जनरल वार्ड में बेड खाली नहीं अगर वो चाहे तो प्राइवेट वार्ड में बेड बुक करवाकर अपने बेटे का इलाज करवा सकते हैं. प्राइवेट बेड का किराया रोज के 1200 रुपये है और  दवाई का खर्चा अलग है. प्रदीप के पास इतना पैसा नहीं है कि वह अपने बेटे को प्राइवेट बेड में एडमिट करवा सके. 

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जब कहीं से कुछ नहीं हुआ तो प्रदीप, वकील अशोक अग्रवाल के पास पहुंच. अशोक अग्रवाल गरीब मरीज़ों को प्राइवेट अस्पताल के रिज़र्व फ्री बेड में एडमिट कराने में मदद करते हैं. आपकी जानकारी के लिए बता दें कि आजकल प्राइवेट अस्पताल में गरीब मरीजों के लिए कुछ बेड रिज़र्व रखे जाते हैं. अशोक अग्रवाल प्रदीप को एक प्राइवेट अस्पताल भेजते हैं लेकिन वहां भी उनके बेटे को एडमिट नहीं हो पाया. प्रदीप को कहा गया कि जब बेड खाली होगा उन्हें बुलाया जाएगा. जब प्रदीप ने पूछा कितना समय लगेगा तो उन्हें यह भी कहा गया कि दो महीने भी लग सकते हैं. प्रदीप फिर दोबारा अग्रवाल जी के पास पहुंचे. अग्रवाल ने अब उन्हें एक दूसरे प्राइवेट अस्पताल भेजा. दूसरे अस्पताल में भी प्रदीप के हाथ निराशा लगी, पहले दिन उन्हें बताया कि अस्पताल में डॉक्टर नहीं है आज, दूसरे दिन उनसे कहा गया कि अस्पताल में उनके बेटे का इलाज संभव नहीं है. 

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फिलहाल प्रदीप के बेटे की तबियत बिगड़ती जा रही है. उनके बेटे के सिर में पानी बढ़ता जा रहा है. बेटे का वजन भी तेजी से कम होता जा रहा है. अपने बेटे का इलाज नहीं करवा पाने की वजह से प्रदीप खुद को लाचार महसूस कर रहे हैं. किसी अस्पताल में डॉक्टर नहीं है तो कहीं बेट खाली नहीं है. तो क्या दिल्ली के मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री प्रदीप की मदद करेंगे. क्या किसी तरह से दिल्ली के सरकारी अस्पताल में प्रदीप के बेटे को एक बेड मिलने में मदद कर पाएंगे. अगर ऐसा हो सके तो प्रदीप के बेटे का इलाज हो पाएगा. 



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