Lok Sabha Election 2019 : क्या इस बार उत्तर प्रदेश से खत्म होगा मुस्लिम सांसदों का सूखा?

2014 में 543 सीटों के लिए हुए चुनाव में सिर्फ 23 मुस्लिम प्रत्याशी लोकसभा में पहुंचने में कामयाब रहे थे.

Lok Sabha Election 2019 : क्या इस बार उत्तर प्रदेश से खत्म होगा मुस्लिम सांसदों का सूखा?

2014 में सिर्फ 23 मुस्लिम प्रत्याशी (Muslim Candidates) लोकसभा में पहुंचे थे.

खास बातें

  • पिछली बार कुल 23 मुस्लिम प्रत्याशी लोकसभा में पहुंचे थे
  • देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में खाता तक नहीं खुला था
  • लेकिन इस बार उत्तर प्रदेश की सूरत बदली नजर आ रही है
नई दिल्ली :

इस बार का लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Election 2019) कई मायनों में अहम है. एक तरफ तमाम पार्टियां अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए चुनाव मैदान में हैं. तो दूसरी तरफ, यह देखना भी दिलचस्प होगा कि क्या इस बार लोकसभा में मुस्लिम सांसदों की संख्या (Muslim Candidates in Lok Sabha) में बढ़ोतरी होती है या नहीं. 2014 में 543 सीटों के लिए हुए चुनाव में सिर्फ 23 मुस्लिम प्रत्याशी लोकसभा में पहुंचने में कामयाब रहे थे. यहां तक कि देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में तो मुस्लिम उम्मीदवारों का खाता तक नहीं खुला, लेकिन इस बार स्थिति बदली नजर आ रही है. एक तरफ, खुद बीजेपी की स्थिति 2014 जितनी मजबूत नहीं है. तो दूसरी तरफ, विपक्ष मोदी सरकार के खिलाफ पूरे दमखम के साथ मैदान में खड़ा नजर आ रहा है.  

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क्या कहते हैं 2014 के आंकड़े 
2014 में सिर्फ 23 मुस्लिम नेता (Muslim Candidates) लोकसभा में पहुंचने में कामयाब रहे. इनमें पश्चिम बंगाल के सर्वाधिक 8, बिहार के 4, केरल के 3, जम्मू-कश्मीर के 3, असम के 2 और आंध्र प्रदेश के एक सांसद शामिल हैं. वहीं, केंद्र शासित प्रदेश लक्षद्वीप से भी एक मुस्लिम प्रत्याशी लोकसभा में पहुंचे. उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र जैसे तमाम राज्यों में मुस्लिम उम्मीदवारों का खाता तक नहीं खुला. वहीं, पिछली बार 53 मुस्लिम उम्मीवार दूसरे स्थान पर रहे थे. लद्दाख से निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरे गुलाम रजा को बीजेपी के थुपस्तान चेवांग से मात्र 36 वोटों से हार का सामना करना पड़ा था.  

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उत्तर प्रदेश में बदल सकती है सूरत 
पिछली बार यूपी में कोई भी मुस्लिम प्रत्याशी (Muslim Candidates) खाता तक नहीं खोल पाया था, लेकिन 19 उम्मीदवार ऐसे थे जो दूसरे स्थान पर रहे थे. 2014 के बाद स्थिति काफी बदल गई है. यूपी में सपा-बसपा गठबंधन (SP-BSP) बीजेपी के खिलाफ एकजुट और आशान्वित है. उप-चुनाव में उन्हें इसका फायदा भी मिला था. 2014 के 'मोदी लहर' में भले ही यूपी से कोई मुस्लिम उम्मीदवार संसद में न पहुंचा हो, लेकिन उप चुनाव में गठबंधन की प्रत्याशी तबस्सुम हसन कैराना से जीतने में कामयाब रहीं. इस बार बदली सियासी परिस्थिति और सपा-बसपा के गठजोड़ को देखते हुए इस बात की संभावना है कि उत्तर प्रदेश मुस्लिम सांसद का सूखा खत्म करने में कामयाब होगा.  

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1980 में 49 मुस्लिम नेताओं ने दर्ज की थी जीत 
आंकड़ों पर नजर डालें तो 1980 के चुनाव में सर्वाधिक मुस्लिम उम्मीदवार लोकसभा में पहुंचने में कामयाब रहे थे. 1980 के चुनाव में 49 नेता सदन के लिए चुने गए थे. हालांकि उसके बाद संख्या में गिरावट ही आई है. 2011 की जनगणना के अनुसार देश की कुल मुस्लिम आबादी 17.2 करोड़ है, लेकिन लोकसभा में उनका प्रतिनिधित्व 10 प्रतिशत से भी कम है.  

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