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प्रियदर्शन

एनडीटीवी इंडिया में 15 वर्षों से कार्यरत. उपन्यास 'ज़िंदगी लाइव', कहानी संग्रह 'बारिश, धुआं और दोस्त' और 'उसके हिस्से का जादू', कविता संग्रह 'नष्ट कुछ भी नहीं होता' सहित नौ किताबें प्रकाशित. कविता संग्रह मराठी में और उपन्यास अंग्रेज़ी में अनूदित. सलमान रुश्दी और अरुंधती रॉय की कृतियों सहित सात किताबों का अनुवाद और तीन किताबों का संपादन. विविध राजनैतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों पर तीन दशक से नियमित विविधतापूर्ण लेखन और हिंदी की सभी महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन.

  • लेकिन प्रधानमंत्री मोदी का जादू जितना टूटा है, उससे कहीं ज़्यादा केजरीवाल का तिलिस्म टूटा है। वह अपने ही आंदोलन के दौरान बने जनलोकपाल विधेयक को हल्का कर पेश कर रहे हैं, वह इस मुद्दे पर अपने पुराने सहयोगियों से बहस करने को तैयार नहीं हैं, वह लालू यादव से गले मिल रहे हैं...
  • साठ के दशक में मनोज कुमार भारत कुमार कहलाते थे। 'उपकार' और 'पूरब और पश्चिम' से लेकर 'क्रांति' तक वे देशप्रेम की रोमानी कहानियां कहते रहे जिनमें देश की धरती सोना और हीरे-मोती उगला करती थी।
  • यह कुछ ही दिनों के भीतर दूसरी बार है जब वित्त मंत्री अरुण जेटली ने दाल और तेल की आसमान छूती क़ीमतों के अपने ज़रूरी मुद्दे पर सफ़ाई देने की जगह बुद्धिजीवियों पर मिथ्या आरोप लगाने में अपनी ऊर्जा जाया की है। लेकिन ये आरोप ख़ुद ही अपनी राजनीतिक सीमाओं की कलई खोलते हैं।
  • वर्ष 1971 के आम चुनावों में कांग्रेस का चुनाव चिह्न 'गाय-बछड़ा' था, मगर फिल्म 'मांझी - द माउंटेनमैन' में इंदिरा गांधी 'हाथ' को मजबूत करने की अपील कर रही हैं। इस तथ्यात्मक चूक के अलावा भी पूरी फिल्म बहुत फिल्मी है।
  • जिस मामले में सैकड़ों लोग गिरफ़्तार हों, इतने ही फ़रार हों, हज़ारों लोग आरोपी बनाए गए हों, और इन सबमें राज्य के राज्यपाल से लेकर कॉलेजों के प्रोफेसर, डॉक्टर, और चपरासी-ड्राइवर तक इल्ज़ामों से घिरे हों, क्या वह बस एक सरकारी तंत्र की विफलता का मामला है?
  • मध्य प्रदेश के एक मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की हंसी देखें तो उनकी सारी सफ़ाइयों के बावजूद यह समझ में आता है कि पत्रकार अक्षय सिंह की मौत भी उन्हें विचलित नहीं कर पाई। लेकिन यह एक आदमी की नहीं, उस व्यवस्था की, उस विचारधारा की गड़बड़ी है जो ऐसा आदमी बनाती है।
  • 84 देशों के नुमाइंदों और 35,000 से ज़्यादा प्रतिभागियों के साथ योग के दो-दो वर्ल्ड रिकॉर्ड बना रही बीजेपी के नेताओं की निगाह आख़िर उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी को क्यों खोजती रही? क्या इसलिए कि वे मुसलमान हैं और उनका फ़र्ज़ बनता है कि वो योग करके अपनी देशभक्ति साबित करें?
  • युद्ध की भाषा बोलना एक आसान काम होता है- नेताओं को ये कुछ ज़्यादा रास आता है। यह एक सरल देशभक्ति है जिसमें कुछ साबित नहीं करना पड़ता, कुछ दांव पर लगाना नहीं पड़ता।
  • दिल्ली में शानदार बहुमत के साथ सरकार बनाने वाले अरविंद केजरीवाल ने अगर समय रहते अपने कानून मंत्री से इस्तीफ़ा ले लिया होता तो शायद जितेंद्र तोमर की गिरफ़्तारी के बाद भी कम से कम उनकी छीछालेदर नहीं होती।
  • 1990 में जब रघुनाथ झा और रामसुंदर दास जैसे उम्मीदवारों को पीछे छोड़कर लालू यादव ने पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री का पद संभाला था, तब लालू यादव को छोड़कर किसी को यक़ीन नहीं था कि बिहार में यह एक नए दौर की शुरुआत है।
  • जब तक कोई मारा नहीं जाता, जब तक किसी औरत से बलात्कार नहीं होता, जब तक कुछ बच्चे अनाथ नहीं हो जाते. तब तक जैसे हम किसी हादसे को हादसा मानते ही नहीं, किसी हमले को हमला मानते ही नहीं।
  • जो लोग मैगी खाना बंद कर देंगे वे क्या खाएंगे? जाहिर है, किसी दूसरे नाम से बिकने वाला कोई दूसरा नूडल जिसमें छुपे ख़तरों से वे वैसे ही बेख़बर होंगे जैसे मैगी से रहे। लेकिन क्या वाकई मैगी इतनी ख़तरनाक है या वाकई हमें मैगी में छुपे ख़तरों का कुछ भी पता नहीं था?
  • 1976 के मांट्रियल ओलिंपिक में ब्रूस जेनर ने डेकाथेलॉन में स्वर्ण पदक जीता। डेकाथेलॉन यानी दस खेलों की प्रतियोगिता जिसमें दुनिया भर के मर्दों की असली ताकत का इम्तिहान होता है। लेकिन जब ब्रूस दौड़ते थे तो उनके भीतर एक औरत भी दौड़ती थी। वह लगातार उनके भीतर दौड़ती रही।
  • दिल्ली की केजरीवाल क्रांति कभी अपनों से उलझ रही है कभी दूसरों से। केजरीवाल जैसे सारे किले फतह करने पर तुले हैं लेकिन हर किले के बाद उनकी छवि की चमक कुछ फ़ीकी पड़ जा रही है। फिलहाल वो दिल्ली में अपने हक़ की लड़ाई लड़ रहे हैं।
  • कश्मीर एक दुखती हुई कहानी का नाम है- एक उदास सुंदरता का अफ़साना जो न जाने कब से बंदूकों के साये में बहती बोझिल हवा में सांस लेने को मजबूर है।
  • एक साल में प्रधानमंत्री की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है? हाल के वर्षों में इस देश ने जितना उन्हें सुना है, जितने ध्यान से सुना है, उतना और उतने ध्यान से किसी को नहीं सुना है
  • वह 42 साल तक एक बिस्तर पर रही- बिना यह जाने कि वह ज़िंदा है या मर चुकी है, बिना यह महसूस किए कि सोना क्या होता है, जागना क्या होता है, खाना-पीना और जीना क्या होता है, हंसना और रोना, फ़िक्र करना और बेफ़िक्र हो जाना क्या होता है।
  • अरुणा शानबाग के लिए उसका जीवन वह नहीं रह गया जो वह हो सकता था। यह पूरा प्रसंग बताता है कि एक जुर्म सिर्फ एक शरीर के साथ एक हादसा नहीं होता, उसके ज़ख्म मन पर भी पड़ते हैं...
  • यह पहली बार नहीं है जब कोई नेता या मुख्यमंत्री पत्रकारिता से परेशान रहा हो और उसे सबक सिखाना चाहता रहा हो। कभी जगन्नाथ मिश्र ने यह कोशिश की, कभी राजीव गांधी ने यह कोशिश की, और तो और लालू यादव ने भी एक दौर में पीली पत्रकारिता की शिकायत की थी। अब अरविंद केजरीवाल यह शिकायत कर रहे हैं।
  • ये बात पते की सलमान ख़ान पर नहीं, उस हिंदुस्तान पर है जो इसलिए इतने भयानक अन्याय करता और झेलता है और एक अमानवीय गैरबराबरी से आंखें मूंद कर चलता रहता है।
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