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सुधीर जैन

सागर विश्वविद्यालय से अपराधशास्त्र व न्यायालिक विज्ञान में स्नातकोत्तर के बाद उसी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर रहे, Ph.D. के लिए 307 सज़ायाफ़्ता कैदियों पर छह साल तक शोधकार्य, 27 साल 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में रहे, सीएसई की नेशनल फैलोशिप पर चंदेलकालीन तालाबों के जलविज्ञान का शोध अध्ययन, देश की पहली हिन्दी वीडियो मैगज़ीन के संस्थापक निदेशक, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस और सीबीआई एकेडमी के अतिथि व्याख्याता, विभिन्न विषयों पर टीवी पैनल डिबेट. विज्ञान का इतिहास, वैज्ञानिक शोधपद्धति, अकादमिक पत्रकारिता और चुनाव यांत्रिकी में विशेष रुचि.

  • दुनिया की हर राजनीतिक व्यवस्था का एक ही लक्ष्य होता है कि उसकी जनता या प्रजा की खुशहाली बढ़े या बदहाली कम हो. लोकतांत्रिक व्यवस्था तो इसी मकसद से ईजाद हुई थी कि उसके सभी नागरिकों की खुशहाली सुनिश्चित हो सके. हर सरकार बदहाली कम करने का नारा लेकर आती है. मौजूदा सरकार इस मामले में कुछ अलग नारा लेकर आई थी, अच्छे दिन या खुशहाली ला देने का नारा. हालांकि, खुशहाली का मापने का विश्वसनीय पैमाना किसी ने नहीं बना पाया. इसीलिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त राष्ट्र ने पूरी दुनिया के अलग अलग देशों में खुशहाली को आंकना शुरू किया. छह साल से संयुक्त राष्ट्र हर साल इस तरह का आकलन करवा रहा है और बाकायदा एक सूचकांक के जरिए एक रिपोर्ट बनती है जो यह बताती है कि किस देश में खुशहाली का क्या स्तर है. इस साल का यह विश्व खुशहाली सूचकांक दो दिन पहले ही जारी हुआ है. चौंकाने और बुरी तरह से झकझोर देने वाली बात यह है कि दुनिया कि 156 देशों में हमारे देश की खुशहाली का नंबर 133वां आया है. यानी औसत से बहुत ही नीचे. पिछले साल से भी 11 नंबर नीचे. इस विश्व रिपोर्ट ने हमें डेढ़ सौ देशों के बीच सबसे बदहाल 25 देशों के संग बैठा दिया है.
  • इस साल की विज्ञान कांग्रेस में विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री के दिए भाषण की चर्चा ने जोर पकड़ लिया है. आमतौर पर ऐसे आयोजनों को आजकल एक औपचारिकता ही माना जाता है. इसीलिए मीडिया में ऐसे भाषणों को ज्यादा तरजीह मिलना बंद हो चला था.
  • क्या इसे बैंकों की हालत हद से ज्यादा नाज़ुक होने का ऐलान माना जाए? सोमवार को रविशंकर प्रसाद की प्रेस कॉन्फ्रेंस से लगा तो ऐसा ही. भले ही उनके अपने मंत्रालय का इससे ज्यादा लेना देना नहीं है लेकिन उनकी सरकारी हैसियत सरकार के प्रवक्ता से कम नहीं है.
  • श्रीदेवी मृत्यु प्रकरण में आखिर मामला खत्म होने की खबर आ गई. लेकिन देश दुनिया में इस दौरान रहस्य और सनसनी फैलती रही. क्या इस स्थिति से बचा जा सकता था? इस मामले ने क्या हमें इतना जागरूक कर दिया है कि आगे ऐसे किसी मामले में हम फिजूल की सनसनी और विवादों में नहीं उलझा करेंगे.
  • भ्रष्टाचार के मामले में हमारा देश अपनी छवि सुधार नहीं पाया. भ्रष्टाचार पर सर्वेक्षण करने वाली विश्व प्रसिद्ध संस्था ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल की सन 17 की रिपोर्ट जारी हो गई. इसमें निकलकर आया है कि एशिया पैसिफिक क्षेत्र के देशों में सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार भारत में है.
  • PNB घोटाले ने देश को सकते में डाल दिया. इस कांड से अब तक सरकार के तरफदार रहे लोग और सरकार का तरफदार मीडिया तक भौंचक है. इसमें कोई शक नहीं कि सरकार कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रही है कि भ्रष्टाचार को लेकर देश में निराशा और हताशा न फैले, लेकिन इस घोटाले ने देश के विश्वास की नींव तक मार कर दी है.
  • बजट के बाद शेयर बाजार की दहशत कम होने का नाम नहीं ले रही है, बल्कि बढ़ती ही जा रही है. मंगलवार को भी निवेशकों के तीन लाख रुपये और डूब गए. मंगलवार को सेंसेक्स 561 अंक और नीचे चला गया. सोमवार को गिरा ही था. यानी बजट के पांच दिन बाद भी लगातार शेयरों का गिरना जारी है.
  • बहुत ही कम होता है कि  आम बजट  की समीक्षाएं एक दिन से ज्यादा चलती हों. बजट में जिस भी तबके से लिया और जिस तबके को दिया जाता है उसका पता बजट भाषण के दौरान ही हो जाता था. इस बार ऐसा नहीं हुआ. बजट वाले पूरे दिन पता ही नहीं चला कि इससे आने वाले साल में किसे फायदा होगा और किसे नुकसान.
  • इस बार का बजट इस सरकार के कार्यकाल का अंतिम पूर्ण बजट होगा. यानी मौजूदा सरकार के कार्यकाल के कामकाज की समीक्षा का आखिरी मौका होगा. जाहिर है कि सरकार चार साल की अपनी उपलब्धियों को दिखाने के लिए आंकड़ेबाजी के सारे हुनर लगा देगी.
  • पिछले चार महीनों में इस विवाद के बहाने साहित्य, कला, इतिहास, जाति, धर्म, राजनीति, कानून व्यवस्था और यहां तक कि फिल्म उद्योग व्यापार के पहलू तक सोचे-विचारे गए. खासतौर पर आज की राजनीति और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच के जटिल संबंधों पर एक शोध प्रबंध लिखने लायक सामग्री तैयार हो गई है. इस प्रकरण सें एक फायदा यह हुआ दिखता है कि हमेशा उठ खड़े होने वाले विवादों का फौरन निपटारा करने के लिए आगे के लिए नजीरें बन कर तैयार हो गई हैं.
  • छह दिन पहले इस बात ने सनसनी फैला दी थी कि सुप्रीम कोर्ट में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. इस बात से लोकतांत्रिक भूचाल इसलिए आया कि न्यायपालिका को लोकतंत्र का सबसे विश्वसनीय खंभा माना जाता है और उसी पर संशय पैदा हो गया. सुप्रीम कोर्ट के चार मौजूदा जजों की प्रेस कॉन्‍फ्रेंस, लोकतांत्रिक भारत में अपने तरह की पहली घटना है.
  • हमारी मौजूदा सरकार अर्थशास्त्रियों और पत्रकारों के लिए एक से बढ़कर एक चुनौतियां पेश कर देती है, और अब उसने यह चुनौती पेश की है कि अर्थशास्त्री और पत्रकार विश्लेषण करें कि FDI (यानी Foreign Direct Investment यानी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश) के नए सरकारी ऐलानों का क्या असर पड़ेगा...?
  • केपटाउन में भारत की हार का विश्लेषण करने में दिक्कत आ रही है. यह पहला टैस्ट मैच था. अभी दो और खेलने हैं. इतना ही नहीं टी20 और वन डे भी खेलने हैं. इसलिए इस हार का विश्लेषण दक्षिण अफ्रीका दौरे में आगे की रणनीति बनाने के लिहाज से भी है.  देखने की बात यह होगी कि विराट कोहली एंड कंपनी केपटाउन के हाल से कितना सबक लेकर आगे बढ़ती है.
  • दुनिया में इस समय सैकड़ों कैलेंडर अस्तित्व में हैं, जिनमें हमारे अपने यानी भारतीय पंचांग भी हैं. लेकिन फिलहाल मौका अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से साल बदलने का है. सो मौके के लिहाल से इस पर नजर डालना प्रासंगिक है...
  • पांच साल तक 2जी घोटाले का प्रचार करके राजनीति होती रही. तो क्या उस झूठ के उजागर होने के बाद टूजी के झूठ घोटाले पर ही हमें वैसा ही असर देखने को मिलेगा? यह सवाल भी खड़ा होगा कि झूठे आरोप लगाने वालों ने इस झूठे आरोप से क्या क्या कमाया.
  • इस मुख्य फैसले को कोई नहीं नकार सकता कि गुजरात का जनादेश BJP के पक्ष में आया है, लेकिन उसके साथ जुड़े दूसरे कई और जनादेशों को देखना हो, तो जनता की दी कई और व्यवस्थाओं को पढ़ा जाना भी ज़रूरी है. यह कवायद इसलिए भी ज़रूरी है, क्योंकि गुजरात का विधानसभा चुनाव वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव को नज़र में रखकर लड़ा जा रहा था.
  • राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने का यह दूसरा दिन है. वैसे उनके पास तेरह साल का राजनीतिक अनुभव है. बहुत कुछ उनके बारे में हम जान समझ चुके हैं लेकिन सबसे लंबे समय तक शासन करने वाले राजनीतिक दल के अघ्यक्ष बनने के बाद उनकी जिम्मेदारी और उनके सामने आने वाली चुनौतियां और जोखिम नए नए होंगे.
  • चुनावी आंकड़ों के इस सांख्यिकीय विश्लेषण को सैफोलॉजी कहते हैं, और यह काम करने वाले खुद को विज्ञानी कहते हैं. वे खुद को सांख्यिकी और राजनीति विज्ञान का विशेषज्ञ कहलाना चाहते हैं. उनकी मुद्रा किसी भौतिक विज्ञानी या रसायनशास्त्री से कम नहीं होती. लेकिन दिक्कत यह है कि उनके आकलन विज्ञान के आकलन की तरह शुद्ध नहीं होते.
  • राहुल गांधी के कांग्रेस अध्‍यक्ष बनने का दिन आ गया. लंबे इंतज़ार के बाद आया. इसके पहले जब-जब उनके अध्यक्ष बनने की राह बनी, कोई न कोई अड़चन आती रही. कभी विपक्ष की तरफ से उनकी छवि पर हमले और कभी राहुल और प्रियंका के बीच बेहतरी की बातें उठवाई जाती रहीं. बहरहाल हमेशा ही उनके कांग्रेस प्रमुख बनने का काम टलता रहा. जिस तरह हर देरी के नफे नुकसान होते हैं उस तरह इस देरी के भी नफे नुकसान की बातें जरूर होनी चाहिए.
  • गुजरात चुनाव में इस बार नई बात यह है कि हरचंद कोशिश के बाद भी हिंदू मुसलमान का माहौल नहीं बन पाया. दूसरी खास बात ये कि वहां के पूर्व मुख्यमंत्री इस समय देश के प्रधानमंत्री हैं. लेकिन वहां सत्तारूढ़ भाजपा इस बार भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भरोसे है.
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