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सुधीर जैन

सागर विश्वविद्यालय से अपराधशास्त्र व न्यायालिक विज्ञान में स्नातकोत्तर के बाद उसी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर रहे, Ph.D. के लिए 307 सज़ायाफ़्ता कैदियों पर छह साल तक शोधकार्य, 27 साल 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में रहे, सीएसई की नेशनल फैलोशिप पर चंदेलकालीन तालाबों के जलविज्ञान का शोध अध्ययन, देश की पहली हिन्दी वीडियो मैगज़ीन के संस्थापक निदेशक, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस और सीबीआई एकेडमी के अतिथि व्याख्याता, विभिन्न विषयों पर टीवी पैनल डिबेट. विज्ञान का इतिहास, वैज्ञानिक शोधपद्धति, अकादमिक पत्रकारिता और चुनाव यांत्रिकी में विशेष रुचि.

  • अपने-पराए का चक्कर चलाने वाले लोग भाषा को भी नहीं छोड़ते. हिन्दी को सचमुच में राजभाषा बनाने की कवायद दसियों साल से चल रही है, लेकिन सितंबर के महीने में हिन्दी पखवाड़े की रस्म निभाने के अलावा कुछ नहीं हो पा रहा है.
  • रेल किराया बढ़ाने का तरीका बड़ा घुमाावदार है. सरकार ने क्या चतुर तरकीब लगाई. कोई आसानी से समझ नहीं पाएगा कि आम जनता के लिए रेल का सफर कितना महंगा हो गया. जो कहेगा उसे जवाब दे दिया जाएगा कि पहले आकर टिकट खरीद लेते. शुरू के सिर्फ दस फीसदी मुसाफिरों को रेल के टिकट पुराने रेट पर मिलेंगे. उसके बाद के 90 फीसदी यात्रियों को औसतन 25 फीसदी ज्यादा किराया देना पड़ेगा.
  • देश के मौजूदा हालात के मद्देनज़र कुछ समाजशास्त्री, खासतौर पर अपराधशास्त्री, निकट भविष्य में भारतीय समाज को एक ऐसी दशा में जाता देख रहे हैं, जिसे एनोमी कहते है. कुछ समाजशास्त्री प्रतिमानहीनता नाम की इस सामाजिक दशा का एक लक्षण कानूनविहीनता भी बता गए हैं. यानी मौजूदा हालत का असर निकट भविष्य में अपराधों की संख्या में बढ़ोतरी के रूप में दिखेगा.
  • हम अगर गौर से देखें और दिखाना चाहें तो देश की आधी से ज्यादा आबादी, जो गांवों में बसती है और उसकी जैसी हालत है, उसे किसी राजनीतिक पाप के कारण के तौर पर साबित कर सकते हैं. गांव का आदमी हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी गुजारा नहीं कर पा रहा है.
  • आजादी मिलने के बाद हमने काम के अधिकार को अपनी व्यवस्था में शामिल कर लेने का ऐलान किया था. कुछ साल पहले तक यह अधिकार अपने आप ही मिलता दिखता रहा हो लेकिन अचानक दिन पर दिन बढ़ती बेरोजगारी के नए दौर में क्या यह नहीं कहा जा सकता कि आर्थिक या रोजगार पाने के मामले में इस समय देश के बहुसंख्य युवा परतंत्रता ही महसूस कर रहे हैं.
  • दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में शनिवार को नदियों को आपस में जोड़ने के बारे में बात हुई. इस कार्यक्रम में लोगों को यह कहकर बुलाया गया था कि आएं और अपनी बात रखें कि नदियों को जोड़ा जाना ठीक रहेगा या नहीं. इस आयोजन में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी के प्रोफेसर शरद जैन को नदी जोड़ के विभिन्न पहलुओं के बारे में बताना था.
  • कुल मिलाकर पूरी बात एक वाक्य में इस तरह भी कही जा सकती है कि पाकिस्तान से संबंधों को लेकर हम एक नए वाक्य की रचना करने की स्थिति में भी नहीं हैं.
  • अब जब कानून बदला ही जा रहा है, तो इसका असर दूर तक जाना तय है। लेकिन कहीं ऐसा न हो कि तात्कालिक लाभ के चक्कर में या अपनी बड़ी जिम्मेदारियों से भागने का इंतज़ाम करने के चक्कर में बड़ी-बड़ी समस्याएं खड़ी हो जाएं।
  • गाय को अब धर्म विवाद से आगे बढ़ाकर जाति विवाद में भी डाल दिया गया है। गुजरात का उना कांड इसका सबूत है। सवर्ण और दलितों के बीच सांप्रदायिक भेदभाव बढ़वाने की कोशिशें क्या क्या नई परेशानियां पैदा करेंगी, यह जल्द ही सामने आने लगेगा।
  • चंदेलकालीन तालाबों पर शोधकार्य भले ही 1988 में हुआ हो लेकिन इन प्राचीन जल संरचनाओं पर सरकारी स्तर पर कुछ करने की बात तीन साल पहले ही शुरू हो पाई थी।
  • जल प्रबंधन के लिए पुराने तालाबों के इस्तेमाल की बात से पहली बार पता चलेगा कि देश की नाजुक माली हालत में इन 1000 साल पुराने तालाबों की आज भी कीमत क्या है। बहुत संभव है कि मजबूरी में देश की जो नई जल नीति बनेगी उसमें हमें चंदेलकालीन जल प्रबंधन की बारीकियों को फिर याद करना पड़ेगा।
  • वेतन आयोग ने इस बार देश की मौजूदा माली हालत का एक्सरे भी निकाल दिया है। अचानक हमें यह सुनने को मिला कि देश की इस समय माली हालत ऐसी नहीं है कि कर्मचारियों की तनख्वाह में इसके पहले के वेतन आयोग जितनी बढ़ोतरी की जा सके।
  • एनएसजी पर देश की छीछालेदर ने सोचने को मजबूर कर दिया है। ये बात अलग है कि इस मामले में प्रबुद्ध, जागरूक और वैज्ञानिकों का वर्ग देश की मौजूदा हलचल पर चुप है। ऐसे लोगों पर तो चलिए चुप रहने की दबिश हो भी सकती है, लेकिन देश के मौजूदा राजनीतिक विपक्ष का सिर्फ चश्मदीद बने रहना हैरानी पैदा करता है।
  • नई सरकार ने महंगाई रोकने के अपने उपायों का प्रचार करने में एड़ी-चोटी का दम लगा दिया लेकिन कोई मानने को तैयार नहीं है कि महंगाई काबू में आ गई।
  • प्रधानमंत्री के ताजा विदेशी दौरों की समीक्षा करने में मीडिया बड़ी उलझन में दिखा। वैसे तो दूसरे देशों से संबंध के मामले में सभी देशों के आम लोग एकमत से स्वार्थी हो जाते हैं। वे यही देखते हैं कि दूसरे देश से हमें क्या फायदा मिलने वाला है।
  • अगर मौसम विभाग ने विश्वसनीय प्रणाली से हिसाब लगाया है तो अनुमान है कि इस बार सामान्य से नौ फीसद अतिरिक्त पानी बादलों से मिलेगा। इस साल हमें तीन सौ साठ घन किलोमीटर पानी अतिरिक्त मिलने जा रहा है। लेकिन अफसोस यह कि सारा का सारा बहुमूल्य पानी हम अगले साल पड़ने वाले सूखे के दिनों के लिए रोककर नहीं रख पाएंगे।
  • देश में भयावह सूखे के बाद अब बाढ़ का अंदेशा खड़ा हो गया है। मौसम विभाग ने खुशफहमी के चक्कर में इस साल बारिश के अनुमान को जिस तरह प्रचारित किया है उससे विशेषज्ञों के बीच खुशी की बजाए बाढ़ का डर ज्यादा बैठ गया है। पिछले साल के मुकाबले इस साल 28 फीसदी ज्यादा पानी बरसने का अंदाजा है।
  • अपने दो साल की उपलब्धियों का प्रचार करने में सरकार ने पूरी ज़ान लगा दी। कई क्षेत्रों के कलाकारों के जरिए इसे देशव्यापी बनाने की कोशिश हुई। जब तक कोई नई उम्मीद नहीं जगती, ऐसे आयोजन सबसे अच्छा विकल्प हैं।
  • उप्र और पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए ओपिनियन पोल वाले लोग अपने-अपने 'बैंड बजाने' के लिए तैयार खड़े हैं।
  • देश के उद्योग और व्यापार मंडल यानी एसोचैम ने सूखे के कारण अर्थव्यवस्था के 'भट्ठा' बैठ जाने की चेतावनी दे दी है। एसोचैम के हिसाब से अर्थव्यवस्था पर साढ़े छह लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ने का अंदेशा है।
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