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सुधीर जैन

सागर विश्वविद्यालय से अपराधशास्त्र व न्यायालिक विज्ञान में स्नातकोत्तर के बाद उसी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर रहे, Ph.D. के लिए 307 सज़ायाफ़्ता कैदियों पर छह साल तक शोधकार्य, 27 साल 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में रहे, सीएसई की नेशनल फैलोशिप पर चंदेलकालीन तालाबों के जलविज्ञान का शोध अध्ययन, देश की पहली हिन्दी वीडियो मैगज़ीन के संस्थापक निदेशक, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस और सीबीआई एकेडमी के अतिथि व्याख्याता, विभिन्न विषयों पर टीवी पैनल डिबेट. विज्ञान का इतिहास, वैज्ञानिक शोधपद्धति, अकादमिक पत्रकारिता और चुनाव यांत्रिकी में विशेष रुचि.

  • स्टार्टअप कार्यक्रम का ऐलान हो गया। इसे लेकर देश के संभावित युवा उद्यमियों में बड़ा कौतूहल था। नए कार्यक्रम के ऐलान से उन्हें पता चला कि सरकार ने नए उद्यमियों के सुभीते के लिए चार साल तक हर साल ढाई हजार करोड़ रुपए यानी दस हजार करोड़ का एक कोष बनाने का ऐलान किया है।
  • बहरहाल, मौजूदा हालात में आने वाला बजट यह सबक तो देगा ही कि जब तक पैसे का इंतज़ाम न हो, बड़े-बड़े काम न अमासे जाएं, वरना हर बजट में वायदों की पोल खुलती जाएगी।
  • बुंदेलखंड के हालात बता रहे हैं कि केंद्र सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती सूखे से बेहाल बुंदेलखंड की बनने वाली है। यह देश का वह इलाका है जहां डेढ़ करोड़ से ज्यादा किसान आबादी इस बार खेतों में बुआई तक नहीं कर पाई।
  • प्रधानमंत्री का अचानक पाकिस्तान पंहुच जाना क्या था? इसे कोई भी बता नहीं पा रहा है। ऐन वक्त पर औचक-भौंचक दौरे का पता लगने के बाद खुद भाजपा के प्रवक्ताओं को भी तैयार होने में ढाई घंटे से ज्यादा लग गए। इस बीच टीवी पर अफरातफरी मची रही।
  • विश्लेषण करें तो मजबूरी के हालात में विकास के सपनों को छोड़कर वापस धार्मिक आस्था पर लौटने की अटकल खारिज नहीं की जा सकती। बस, देखना यह होगा कि कोई मुद्दा, जो अपने चरमोत्कर्ष को पहले ही पार कर चुका हो, क्या उसका इस्तेमाल फिर उतना ही धारदार बनाया जा सकता है...?
  • निर्भया की चीख की बरसी पर लगभग वैसी ही सनसनी आज भी है। यह वो कांड था जिस पर मीडिया ने अपनी सनसनीखेज रिपोर्टिंग से देश के रोंगटे खड़े कर दिए थे। उसके बाद आम आदमी ने आपराधिक न्याय प्रणाली पर सीधे सड़कों पर उतरकर प्रतिक्रिया जतानी शुरू कर दी थी।
  • सलमान खान के बरी होने पर उसी तरह गली-गली चर्चा है, जिस तरह उन्हें सजा होने पर होती। हाईकोर्ट से सलमान के बरी होने का फैसला आए कुछ घंटे ही हुए हैं। आमतौर पर अदालती फैसलों की कॉपी को ध्यान से पढ़ने-समझने में ही सुबह से शाम हो जाती है, लेकिन इस मामले के हर नुक्ते पर ठोककर बोलने वालों का तांता लगा हुआ है।
  • देश के बदले माहौल में रोज नई-नई बातें सामने आ जाती हैं। पहले दो-चार मुद्दे ही हुआ करते थे, और उन्हें पकड़कर महीनों महीनों लगातार चलाया जाता था।
  • इस साल देश में लगातार दूसरे साल बारिश कम हुई है। कई इलाके सूखे की चपेट में हैं - मसलन बुंदेलखंड। उत्तर प्रदेश ने तो अपने आधे से ज्यादा जिले सूखाग्रस्त घोषित कर दिए। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की भी बुरी हालत है।
  • फिर भी इस बार के विमर्श में एक नई बात तो दिखी है कि नेताओं की तरफ से आतंकवाद के मूल कारणों पर इशारे होना शुरू हुए हैं। दूसरी नई बात यह दिखी है कि कुछ शौकिया विशेषज्ञों की ओर से इस समस्या को दशकों के इतिहास की रोशनी में दिखाने की भी कोशिश शुरू हुई।
  • देश में मंदी दस्तक दे रही है। आर्थिक हालात को एक नजर में देखने वाले अच्छी तरह से जानते हैं कि ये क्या बला है। लेकिन मुश्किल यह है कि ऐसे अर्थशास्त्री यानी समष्टिभाजी अर्थशास्त्र के विद्वान इस समय मीडिया से गायब हैं।
  • राजनीतिक घटनाओं के विश्लेषण का रिवाज़ कुछ कम होता जा रहा है। बिहार विधानसभा चुनाव की घटनाओं का तथ्यपरक विश्लेषण तो दुर्लभ ही हो गया।
  • विश्व में आर्थिक मंदी की आहट है। भारत में इसके असर की बात उठने को हुई थी लेकिन पीएम के विदेश दौरों और बिहार चुनाव के बीच देश में मंदी के अंदेशे पर बातचीत का मौका बन नहीं पाया।
  • नागरिक या पाठक के तौर पर हमारी मजबूरी भी देखिए - साहित्यकार ही मानव की जटिलताओं को सरल और रोचक बनाकर सुरुचिपूर्ण तरीके से व्यक्त करने में सक्षम होते हैं, और जब वे ही मुश्किल में फंस गए, तो अच्छे साहित्य से हमारा वंचित हो जाना तो तय है ही।
  • पुरस्कृत साहित्यकार उन्हें मिले सम्मान वापस करने का सिलसिला बनाए हुए हैं। वैसे गाहेबगाहे ऐसा होता रहता था, लेकिन इस बार एक बात खास है। आज साहित्यकार तबका चौतरफा असंतोष में है, इसीलिए यह ज़्यादा गौरतलब है।
  • ऊंचे किस्म के राजनैतिक तबके में अच्छी सरकार के बारे में अंग्रेजी का एक टुकड़ा इस्तेमाल होता है, 'टु एन्श्योर द डिलीवरी ऑफ गुड्स...' इस बात का सरल हिन्दी में अनुवाद करें तो वह सरकार, जो अपने नागरिकों की बुनियादी जरूरतें पूरी करने का काम सुनिश्चित करे।
  • इधर सैद्धांतिकता को छोड़कर व्यावहारिकता के नाम पर जब समस्या के बारे में रेडीमेड समाधानों पर नजर डालते हैं तो फिर दुविधा की स्थिति दिखने लगती है, क्योंकि मौजूदा विद्वान लोग फांसी की सजा के पक्ष और विपक्ष में बंटे हुए हैं।
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