NDTV Khabar
होम | ब्लॉग |   सुधीर जैन 

सुधीर जैन

सागर विश्वविद्यालय से अपराधशास्त्र व न्यायालिक विज्ञान में स्नातकोत्तर के बाद उसी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर रहे, Ph.D. के लिए 307 सज़ायाफ़्ता कैदियों पर छह साल तक शोधकार्य, 27 साल 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में रहे, सीएसई की नेशनल फैलोशिप पर चंदेलकालीन तालाबों के जलविज्ञान का शोध अध्ययन, देश की पहली हिन्दी वीडियो मैगज़ीन के संस्थापक निदेशक, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस और सीबीआई एकेडमी के अतिथि व्याख्याता, विभिन्न विषयों पर टीवी पैनल डिबेट. विज्ञान का इतिहास, वैज्ञानिक शोधपद्धति, अकादमिक पत्रकारिता और चुनाव यांत्रिकी में विशेष रुचि.

  • सरकार ने एलान करवा दिया है कि देश की अर्थव्यवस्था पर नोटबंदी का ज्यादा असर नहीं पड़ा. विश्वसनीयता के प्रबंधन के लिए यह एलान बाकायदा केंद्रीय सांख्यिकी संगठन के जरिए किया गया है. यह संगठन ही देश में सकल घरेलू उत्पाद की नापतौल करता है. चलन के मुताबिक हर तीन महीने में, यानी साल में चार बार यह आंकड़े जारी करवाए जाते हैं. इस आंकड़े ने इतनी हलचल मचा रखी है कि अब इस पर बहस की तैयारी है.
  • अब जब चुनाव आखिरी दौर में है, तो वे बातें ज़रूर कर ली जानी चाहिए, जिन्हें करने का मौका बाद में नहीं मिलता. ऐसी ही एक बात यह है कि इस चुनाव में किस-किसका क्या-क्या और कितना दांव पर लग गया है.
  • उत्तरप्रदेश के चुनाव में भले ही और कुछ नया न दिख रहा हो लेकिन भाषा जरूर अचानक बदल गई है. भाषा विवेक पर सभ्य समाज इशारे जरूर कर रहा है लेकिन यह पता नहीं चल रहा है कि आखिर ये बदलाव आया किस रूप में है. यह बदलाव भाषा का है या शैली का है? या साहित्यसुलभ रस और अलंकार के इस्तेमाल में कोई बदलाव आ गया है. सामान्य अनुभव से देखें तो तार्किकता के लिए जरूरी शांत रस राजनीतिक भाषणों में लगभग गायब ही हो चला है.
  • जब सभी राजनीतिक दलों के नेता रोज लंबे-लंबे भाषण दे रहे हैं तो यह कहना भी ठीक नहीं होगा कि यूपी चुनाव में मुददे की बातें हो नहीं रही हैं. जिसकी अपनी जो विशेषता, विशेषज्ञता होती है वह जरूर चाहता है कि चुनाव में उसकी विशेषता ही मुख्य मुददा बन जाए. सो यह बात यूपी में पिछले दस दिनों में खूब दिखाई दी. इस तरह एक से बढ़कर एक चुनावी खिलाड़‍ियों ने अपने प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी की बात का जवाब देने की बजाए सिर्फ अपनी बात ही कहना ठीक समझा.
  • इस साल के बजट के असर के बारे में कुछ सनसनीखेज बातें निकलकर आना शुरू हो गई हैं. खास तौर पर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के पूर्व गवर्नर सी रंगराजन ने बहुत ही बड़ी बात की तरफ इशारा किया है. साफ-साफ कहने के बजाए उन्होंने अपनी बात छुपाकर कही है. उन्होंने अपनी जिम्मेदारी समझते हुए ही छुपाव किया होगा. लेकिन अगर सिर्फ इशारा ही किया है तो वाकई यह भी जिम्मेदारी का निर्वाह ही है. अब यह देश के विद्वानों और जागरूक नागरिकों का काम है कि उनके इशारे की व्याख्या करें.
  • बजट की समीक्षा करने का काम साल दर साल कठिन होता जा रहा है. बजट अब ठोस आंकड़ों की बजाए लंबे-लबे वाक्यों का रूप लेने लगा है. फिर भी ऐसा नहीं है कि बजट को एक नजर में देखा न जा सके.
  • सिद्ध होता है कि चुनाव सर्वेक्षण अपनी संपूर्ण सतर्कता की स्थिति में भी अविश्वसनीय ही हैं. हालांकि ऐसे अनुमानों को तरह तरह से वैज्ञानिकता और सैम्पल के साइज़ का तर्क देकर विश्वसनीय दिखा दिया जाता है.
  • चीनी उत्पादन के आंकड़ों के बहाने एक बात तो साफ हो गई कि हर क्षेत्र में सुचारु व्यवस्था के लिए आंकड़ों को जमा करने के अलावा कोई और विकल्प है ही नहीं, इसीलिए हमें यह जान लेना चाहिए कि इन दिनों सांख्यिकीय तथ्यों का मज़ाक उड़ाकर जो सिर्फ शाब्दिक वक्तव्यों का ज़ोर बढ़ रहा है, उस पर भी गौर करने का वक्त आ गया है.
  • जिस दिन नोटबंदी का ऐलान हुआ था तब पता नही चल पा रहा था कि सरकार के मन में क्या है. लेकिन उसके कारणों को अब जरूर समझा जा सकता है. सबको पता है कि अपनी सरकार शुरू से ही जिस तरह की मुश्किल में पड़ी है उससे निजात के लिए उसे बस ढेर सारे पैसे की जरूरत थी, उसी से वादे पूरे होने थे. लेकिन नोटबंदी के जरिए ढेर सारा काला धन बरामद करने में सरकार फेल हो गई
  • आमतौर पर देश के सालाना बजट पर सोचने विचारने का काम डेढ़ दो महीने पहले से शुरू हो जाता था. लेकिन इस साल नोटबंदी ने देश को इस कदर उलझाए रखा कि यह काम रह ही गया. वैसे नवंबर के दूसरे हफ्ते में नोटबंदी करते समय सरकार के सामने इस साल का बजट ही रहा होगा. सबको पता है कि पिछले साल बजट बनाने में सरकार कितनी मुश्किल में पड़ गई थी.
  • राहुल गांधी का भाषण देखकर लगता है कि उन्‍होंने संभवतया आज सुबह अमेरिकी राष्‍ट्रपति बराक ओबामा का भाषण जरूर सुना होगा क्‍योंकि जिस अंदाज में ओबामा ने अपने भाषण में लोकतंत्र, लोकतांत्रिक संस्‍थाओं की मजबूती पर जोर दिया, कमोबेश वैसा ही चिंता भारत के संदर्भ में राहुल के भाषण में भी दिखी.
  • प्रदेशों की राजनीतिक हलचल को देखें तो महत्व और रोचकता के लिहाज से एकदम किसी नेता का नाम सामने नहीं आता. ठहरकर याद करें, तो पीएम नरेंद्र मोदी व कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के अलावा थोड़ी-बहुत नज़र अरविंद केजरीवाल पर पड़ती है.
  • उनके लिए कोई उपमा नहीं सोची जा सकती. वह वाकई अनुपम थे. उनसे मेरी पहचान प्रभाष जोशी ने करवाई थी. सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट के लिए भारतीय जल प्रबंधन पर शोध के सिलसिले में अनुपम जी से पहली मुलाकात हुई, और फिर उनसे राग हो गया.
  • निर्भया कांड की चौथी बरसी पर एक बार फिर पलटकर देखने का मौका है. उस वीभत्स, भयानक और घिनौने अपराध ने देश को इतना झकझोर दिया था. कानून तो तब भी हमारे पास पर्याप्त थे लेकिन उस मामले के बाद हमने अलग से कानून बनाने की कवायद भी की थी. कुछ ऐसी संजीदगी जताई गई थी जैसे आगे से महिलाओं पर जोरजुल्म पर रोक लग जाएगी. लेकिन रोज खबरें मिलती हैं कि महिलाओं के प्रति अपराध और अत्याचार की स्थिति आज भी ठीक नहीं है.
  • अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आज एक देश दूसरे देश से अपनी सुरक्षा को सुनिश्चित नहीं कर पा रहा है. अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां दिन पर दिन कृषकाय होती जा रही हैं. सिर्फ अपने देश को देखें तो जहां मानवोचित भोजन, पानी, कपड़ा और मकान को सुनिश्चित करने में सरकारें हांफने लगी हों वहां सुरक्षा जैसी द्वितीयक आवश्यकता या अधिकार बहुत दूर की बात है.
  • नोटबंदी की मियाद खत्म होने के बाद जितने नोट जमा नहीं होंगे, उतनी रकम के नए नोट रिजर्व बैंक बेधड़क छाप लेगा, क्योंकि उतना सोना पहले से सरकारी तिजोरी में जमा है. जिनका काला धन रद्दी का टुकड़ा बना दिया गया, वे चाहे फेंकें या जलाएं या बहाएं, यह उनका सिरदर्द था. काले धन वालों का यह दर्द सरकार अपने सिर क्यों ले रही है. ऐसा करना क्या अपने आप में एक घोटाला साबित नहीं हो जाएगा.
  • नोटबंदी से अब जो हमें हासिल होने की उम्मीद बंधाई गई है उसके सहारे एक महीना और भी काटा जा सकता है, लेकिन इसके दूसरे जोखिमों और अंदेशों को देखकर उनका पहले से इंतजाम करके रख लेना चाहिए. ऐसा ही एक अंदेशा है कि देश अपराध बढ़ने को लेकर संवेदनशील हो चुका है.
  • नोटबंदी दो हफ्ते के भीतर ही आज़ाद भारत के इतिहास में यह घटना अभूतपूर्व सिद्ध हो गई है. राष्ट्रहित के बैनर पर मीडिया ने सरकार से भी दो कदम आगे आकर जिस तरह नोटबंदी को सराहा है, और एक राष्ट्रभक्त कार्यकर्ता की तरह सरकार का साथ दिया है, उसे सिर्फ देश में नहीं, पूरी दुनिया में बड़े कौतूहल से देखा गया होगा.
  • अभी यह तो पता नहीं चल रहा है कि कालेधन की मुहिम मोटे-ताजे भ्रष्टाचारियों पर दूर से कितना डर बैठा पा रही है. लेकिन ये जरूर दिखने लगा है कि अब तक जो खुद को भ्रष्टाचारी नहीं समझता था उसके भीतर भी डर बैठ रहा है कि अपनी आमदनी और खर्चे का पूरा हिसाब कैसे बताए.
  • बड़ा सवाल है कि काला धन यानी नंबर दो का पैसा नोटों की शक्ल में कितने लोग रखते होंगे. कालाधन रखने का मुनाफेदार जरिया सोना और बेनामी जमीन जायदाद होती है.
«123456789»

Advertisement