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सुधीर जैन

सागर विश्वविद्यालय से अपराधशास्त्र व न्यायालिक विज्ञान में स्नातकोत्तर के बाद उसी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर रहे, Ph.D. के लिए 307 सज़ायाफ़्ता कैदियों पर छह साल तक शोधकार्य, 27 साल 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में रहे, सीएसई की नेशनल फैलोशिप पर चंदेलकालीन तालाबों के जलविज्ञान का शोध अध्ययन, देश की पहली हिन्दी वीडियो मैगज़ीन के संस्थापक निदेशक, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस और सीबीआई एकेडमी के अतिथि व्याख्याता, विभिन्न विषयों पर टीवी पैनल डिबेट. विज्ञान का इतिहास, वैज्ञानिक शोधपद्धति, अकादमिक पत्रकारिता और चुनाव यांत्रिकी में विशेष रुचि.

  • जो भी निष्ठावान शिक्षक समाज है वह अपने को दुविधा में पाता है. उसे जब खुद ही लगने लगता है कि उसका किया शिक्षाकर्म न तो समाज के काम आ रहा है और और न ही उसके छात्र को रोजगार या आजीविका का साधन दे पा रहा है वैसी स्थिति में अपनी शिक्षा प्रणाली और उसकी धुरी शिक्षक की दुविधा पर विमर्श क्यों नहीं होना चहिए.
  • डेरा सच्‍चा सौदा प्रमुख बाबा गुरमीत राम रहीम को सज़ा ने देश के माहौल में कितना फर्क़ डाला है? इस सवाल पर सोचना शुरू करें तो हमें अपनी दंड नीति की समीक्षा करनी पड़ेगी. एक अपराधशास्त्री की हैसियत से यहां सिर्फ उन बातों की चर्चा करना ठीक होगा जो विवादास्पद न हों.
  • राजसत्ता और धर्म सत्ता के बीच की जटिलताओं का एक भरा पूरा राजनीतिक इतिहास है. अब तक यह राजनीतिक चिंतन का ही विषय था लेकिन डेरा प्रकरण ने इसे न्यायिक क्षेत्र का विषय भी बना दिया. अब तक यह गंभीर विषय माना जाता था.
  • देश में आए दिन बड़े-बड़े ट्रेन हादसे वाकई चिंता की बात है. खतौली में भयावह ट्रेन हादसे से असुरक्षा का डर बैठ गया था. लेकिन हद ये हो गई कि तीन दिन के भीतर औरैया में एक और ट्रेन पटरी से उतर गई. खतौली हादसे का ठीकरा फोड़ने के लिए सिरों की तलाश हो ही रही थी कि एक और हादसा होने से सरकार की छवि पर और बड़ा संकट आ गया.
  • गोरखपुर कांड में बच्चों के मरने के बाद सरकार अपने गुनाह को नकारती जा रही है. लेकिन उसे अपनी छवि की चिंता जरूर परेशान करती रही.
  • नए विश्वविद्यालय के ऐलान से माहौल में उम्मीद के रूप में एक स्फूर्ति तो आती ही है. यह उम्मीद और बढ़ जाती है जब प्रस्तावित विश्वविद्यालयों के आगे विश्वस्तरीय लगा हो...
  • बिहार में अचानक राजनीतिक तूफान आया और कुछ ही घंटों में सरकार बदल गई. वैसे बाहर से दिखने में ऐसा लगता नहीं है क्योंकि मुख्यमंत्री वही हैं और मुख्यमंत्री की अपनी पार्टी जेडीयू अभी भी बिहार सरकार में है. बस गठबंधन का नाम बदला है.
  • हमने दसियों दंतविहीन नियामक ज़रूर बनाए, लेकिन उनकी असरदारी को हम आज तक महसूस नहीं कर पाए. लेकिन आज जब पत्रकारिता के सामने अपनी विश्वसनीयता का ही सबसे बड़ा संकट खड़ा हो गया हो, तो वह अपने इस संकट से निपटने के लिए आचार संहिता की बात मान भी सकती है.
  • अर्थशास्त्र में सबसे काम का और सबसे सरल सिद्धांत मांग और आपूर्ति का सिद्धांत माना जाता है. अगर मांग ज्यादा हो और आपूर्ति कम हो, तो महंगाई बढ़ती है. यहां गेहूं-चावल की मांग बढ़ रही है, लेकिन दाम नहीं बढ़ पा रहे हैं. हालत यह है कि उनके दाम बढ़ाने के लिए किसानों को आंदोलन करना पड़ रहा है.
  • यह बात तो सिद्ध हो गई है कि राष्ट्रपति पद भी जातिगत राजनीति के घेरे में आ गया है. ऐसा क्यों करना पड़ा, यह पहेली भी देखी जानी चाहिए. राजनीति के वक्र होते जा रहे इस काल में यह तथ्य देखा जाना चाहिए कि पिछले एक-दो साल से दलितों पर दबिश की घटनाओं से उनमें असंतोष बढ़ा है. इस असंतोष का प्रबंधन हो नहीं पा रहा था.
  • आजकल की सरकारों का तो अपना स्वभाव है कि वे किसी मुद्दे के अपने आप मर जाने का इंतज़ार करती हैं, लेकिन किसानों का यह मुद्दा ज़्यादा खिंच रहा है. लिहाज़ा इस मसले पर कुछ नए सवाल बनते हैं.
  • हैरानी की बात है कि राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का राममनाथ गोयनका व्याख्यान चर्चा में नहीं आ पाया. हालांकि इस व्याख्यान में उन्होंने कई खास बातें कही हैं. प्रबुद्ध वर्ग के लिए यह और भी खास इसलिए था क्योंकि उनकी कही मुख्य बात अचानक बदलती पत्रकारिता और मौजूदा सामाजिक राजनीतिक परिस्थितियों पर थी.
  • नोटबंदी पर रिज़र्व बैंक के गवर्नर के बहुप्रतीक्षित लेखे-जोखे के पेश होने के पहले देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार का यह बयान इस समय समीक्षकों में हलचल ज़रूर पैदा कर रहा होगा...
  • हरियाणा के मुख्यमंत्री ने बातों बातों में एक ऐसी बात कही है कि इस पर विस्तार से विचार हो सकता है. उनका कहना है कि कोई सरकार सत्ता में आने के पहले जो बात कहती है उसके मुताबिक समय पर काम हो पाना कई बार मुश्किल हो जाता है. इसका कारण उन्होंने यह समझाया है कि कुछ सरकारी बंदिशें होती हैं जिनके कारण चुनाव में किए वायदे निभाने में देरी हो जाती है.
  • नए-नए सपनों में सस्ते इलाज का एक और सपना जुड़ गया है. देश में स्वास्थ्य सेवाओं की हालत सबको पता है. महंगे इलाज की सुविधाएं जिस तरह बढ़ रही हैं, उससे हम अंदाज़ा लगा सकते हैं कि सबको स्वास्थ्य का हमारा इरादा किस तरह हारता चला जा रहा है.
  • प्रदेश सरकार की पहली कैबिनेट की बैठक में उद्योग-धंधों के बारे में चर्चा तो हुई थी, लेकिन बेरोज़गारी के बारे में बिजली और गड्ढों को भरने जैसे निश्चित ऐलान नहीं हुए थे. सो, अगले फैसलों में सरकार से सबसे ज़्यादा दरकार इसी बात की होगी कि वह प्रदेश में बेरोज़गारी से निपटने का काम सबसे पहले करे. यही काम गेम चेंजर साबित हो सकता है.
  • आज यानी वित्तीय वर्ष के आखिरी दिन नोटबंदी का सनसनीखेज अनुष्ठान पूरा हो गया. इस आर्थिक राजनीतिक हवन से क्या हासिल हुआ इसका पता अब चलेगा. हालांकि इसे हवन कहे जाने से कुछ लोगों को ऐजराज हो सकता है लेकिन पिछले चार महीनों में इस अनुष्ठान की विधि में रोज़-रोज़ जिस तरह बदलनी पड़ी उससे यह तो तय हो गया कि अपने देश ने एक नवोन्वेषी काम किया. नए तरीके से काम करने में एक जोखिम होता ही है सो अब यह हिसाब लगना शुरू होगा कि नोटबंदी से जो फायदा हुआ है उसकी तुलना में नुकसान कितना हुआ. यह भी देखा जाएगा कि जिस मकसद से यह काम किया गया था वह कितना पूरा हुआ. सिर्फ ऐलानिया मकसद के आधार पर ही समीक्षा करना ठीक होगा. उनके अलावा जो फायदे गिनाए जा रहे होंगे वह नोटबंदी के फैसले का जबरन बचाव करने के अलावा और कुछ नहीं होंगे.
  • उत्तर प्रदेश में किसानों की कर्ज़ माफी एक नया झंझट बनकर खड़ी होने वाली है. उत्तर प्रदेश चुनाव में जितने भी वादे किए गए थे, उनमें सबसे साफ और नापतोल के लायक वादा कर्ज़ माफी का ही था. कर्ज़ माफी किसानों के लिए जीवन-मरण का मुद्दा था, लिहाज़ा इसे भुलाया जाना या दाएं-बाएं किया जाना बहुत मुश्किल है.
  • पांच राज्यों के चुनाव बीजेपी के लिए कांग्रेसमुक्त भारत का सपना साकार करने का एक और मौका था, लेकिन ईमानदारी से और वस्तुनिष्ठ तरीके से विश्लेषण करके देखें तो जनता ने यह नारा बिल्कुल नहीं खरीदा. कांग्रेस उत्तराखंड हारी, तो उससे बड़ा प्रदेश पंजाब जीत गई. गोवा और मणिपुर में वह बीजेपी से आगे खड़ी दिखाई दे रही है.
  • एग्ज़िट पोल वालों ने शतरंज की बाजी बिछा दी है. आश्चर्य नहीं होना चाहिए, अगर 11 मार्च को नतीजे आने से पहले ही सभी दल जोड़-तोड़ करने या जोड़-तोड़ न हो सके, इसकी सुरक्षा में लगे नजर आएं. अगर वाकई ऐसा होता दिखता है तो यह एग्ज़िट पोल वालों का ही कमाल होगा.
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