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सुधीर जैन

सागर विश्वविद्यालय से अपराधशास्त्र व न्यायालिक विज्ञान में स्नातकोत्तर के बाद उसी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर रहे, Ph.D. के लिए 307 सज़ायाफ़्ता कैदियों पर छह साल तक शोधकार्य, 27 साल 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में रहे, सीएसई की नेशनल फैलोशिप पर चंदेलकालीन तालाबों के जलविज्ञान का शोध अध्ययन, देश की पहली हिन्दी वीडियो मैगज़ीन के संस्थापक निदेशक, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस और सीबीआई एकेडमी के अतिथि व्याख्याता, विभिन्न विषयों पर टीवी पैनल डिबेट. विज्ञान का इतिहास, वैज्ञानिक शोधपद्धति, अकादमिक पत्रकारिता और चुनाव यांत्रिकी में विशेष रुचि.

  • नोटबंदी पर रिज़र्व बैंक के गवर्नर के बहुप्रतीक्षित लेखे-जोखे के पेश होने के पहले देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार का यह बयान इस समय समीक्षकों में हलचल ज़रूर पैदा कर रहा होगा...
  • हरियाणा के मुख्यमंत्री ने बातों बातों में एक ऐसी बात कही है कि इस पर विस्तार से विचार हो सकता है. उनका कहना है कि कोई सरकार सत्ता में आने के पहले जो बात कहती है उसके मुताबिक समय पर काम हो पाना कई बार मुश्किल हो जाता है. इसका कारण उन्होंने यह समझाया है कि कुछ सरकारी बंदिशें होती हैं जिनके कारण चुनाव में किए वायदे निभाने में देरी हो जाती है.
  • नए-नए सपनों में सस्ते इलाज का एक और सपना जुड़ गया है. देश में स्वास्थ्य सेवाओं की हालत सबको पता है. महंगे इलाज की सुविधाएं जिस तरह बढ़ रही हैं, उससे हम अंदाज़ा लगा सकते हैं कि सबको स्वास्थ्य का हमारा इरादा किस तरह हारता चला जा रहा है.
  • प्रदेश सरकार की पहली कैबिनेट की बैठक में उद्योग-धंधों के बारे में चर्चा तो हुई थी, लेकिन बेरोज़गारी के बारे में बिजली और गड्ढों को भरने जैसे निश्चित ऐलान नहीं हुए थे. सो, अगले फैसलों में सरकार से सबसे ज़्यादा दरकार इसी बात की होगी कि वह प्रदेश में बेरोज़गारी से निपटने का काम सबसे पहले करे. यही काम गेम चेंजर साबित हो सकता है.
  • आज यानी वित्तीय वर्ष के आखिरी दिन नोटबंदी का सनसनीखेज अनुष्ठान पूरा हो गया. इस आर्थिक राजनीतिक हवन से क्या हासिल हुआ इसका पता अब चलेगा. हालांकि इसे हवन कहे जाने से कुछ लोगों को ऐजराज हो सकता है लेकिन पिछले चार महीनों में इस अनुष्ठान की विधि में रोज़-रोज़ जिस तरह बदलनी पड़ी उससे यह तो तय हो गया कि अपने देश ने एक नवोन्वेषी काम किया. नए तरीके से काम करने में एक जोखिम होता ही है सो अब यह हिसाब लगना शुरू होगा कि नोटबंदी से जो फायदा हुआ है उसकी तुलना में नुकसान कितना हुआ. यह भी देखा जाएगा कि जिस मकसद से यह काम किया गया था वह कितना पूरा हुआ. सिर्फ ऐलानिया मकसद के आधार पर ही समीक्षा करना ठीक होगा. उनके अलावा जो फायदे गिनाए जा रहे होंगे वह नोटबंदी के फैसले का जबरन बचाव करने के अलावा और कुछ नहीं होंगे.
  • उत्तर प्रदेश में किसानों की कर्ज़ माफी एक नया झंझट बनकर खड़ी होने वाली है. उत्तर प्रदेश चुनाव में जितने भी वादे किए गए थे, उनमें सबसे साफ और नापतोल के लायक वादा कर्ज़ माफी का ही था. कर्ज़ माफी किसानों के लिए जीवन-मरण का मुद्दा था, लिहाज़ा इसे भुलाया जाना या दाएं-बाएं किया जाना बहुत मुश्किल है.
  • पांच राज्यों के चुनाव बीजेपी के लिए कांग्रेसमुक्त भारत का सपना साकार करने का एक और मौका था, लेकिन ईमानदारी से और वस्तुनिष्ठ तरीके से विश्लेषण करके देखें तो जनता ने यह नारा बिल्कुल नहीं खरीदा. कांग्रेस उत्तराखंड हारी, तो उससे बड़ा प्रदेश पंजाब जीत गई. गोवा और मणिपुर में वह बीजेपी से आगे खड़ी दिखाई दे रही है.
  • एग्ज़िट पोल वालों ने शतरंज की बाजी बिछा दी है. आश्चर्य नहीं होना चाहिए, अगर 11 मार्च को नतीजे आने से पहले ही सभी दल जोड़-तोड़ करने या जोड़-तोड़ न हो सके, इसकी सुरक्षा में लगे नजर आएं. अगर वाकई ऐसा होता दिखता है तो यह एग्ज़िट पोल वालों का ही कमाल होगा.
  • सरकार ने एलान करवा दिया है कि देश की अर्थव्यवस्था पर नोटबंदी का ज्यादा असर नहीं पड़ा. विश्वसनीयता के प्रबंधन के लिए यह एलान बाकायदा केंद्रीय सांख्यिकी संगठन के जरिए किया गया है. यह संगठन ही देश में सकल घरेलू उत्पाद की नापतौल करता है. चलन के मुताबिक हर तीन महीने में, यानी साल में चार बार यह आंकड़े जारी करवाए जाते हैं. इस आंकड़े ने इतनी हलचल मचा रखी है कि अब इस पर बहस की तैयारी है.
  • अब जब चुनाव आखिरी दौर में है, तो वे बातें ज़रूर कर ली जानी चाहिए, जिन्हें करने का मौका बाद में नहीं मिलता. ऐसी ही एक बात यह है कि इस चुनाव में किस-किसका क्या-क्या और कितना दांव पर लग गया है.
  • उत्तरप्रदेश के चुनाव में भले ही और कुछ नया न दिख रहा हो लेकिन भाषा जरूर अचानक बदल गई है. भाषा विवेक पर सभ्य समाज इशारे जरूर कर रहा है लेकिन यह पता नहीं चल रहा है कि आखिर ये बदलाव आया किस रूप में है. यह बदलाव भाषा का है या शैली का है? या साहित्यसुलभ रस और अलंकार के इस्तेमाल में कोई बदलाव आ गया है. सामान्य अनुभव से देखें तो तार्किकता के लिए जरूरी शांत रस राजनीतिक भाषणों में लगभग गायब ही हो चला है.
  • जब सभी राजनीतिक दलों के नेता रोज लंबे-लंबे भाषण दे रहे हैं तो यह कहना भी ठीक नहीं होगा कि यूपी चुनाव में मुददे की बातें हो नहीं रही हैं. जिसकी अपनी जो विशेषता, विशेषज्ञता होती है वह जरूर चाहता है कि चुनाव में उसकी विशेषता ही मुख्य मुददा बन जाए. सो यह बात यूपी में पिछले दस दिनों में खूब दिखाई दी. इस तरह एक से बढ़कर एक चुनावी खिलाड़‍ियों ने अपने प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी की बात का जवाब देने की बजाए सिर्फ अपनी बात ही कहना ठीक समझा.
  • इस साल के बजट के असर के बारे में कुछ सनसनीखेज बातें निकलकर आना शुरू हो गई हैं. खास तौर पर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के पूर्व गवर्नर सी रंगराजन ने बहुत ही बड़ी बात की तरफ इशारा किया है. साफ-साफ कहने के बजाए उन्होंने अपनी बात छुपाकर कही है. उन्होंने अपनी जिम्मेदारी समझते हुए ही छुपाव किया होगा. लेकिन अगर सिर्फ इशारा ही किया है तो वाकई यह भी जिम्मेदारी का निर्वाह ही है. अब यह देश के विद्वानों और जागरूक नागरिकों का काम है कि उनके इशारे की व्याख्या करें.
  • बजट की समीक्षा करने का काम साल दर साल कठिन होता जा रहा है. बजट अब ठोस आंकड़ों की बजाए लंबे-लबे वाक्यों का रूप लेने लगा है. फिर भी ऐसा नहीं है कि बजट को एक नजर में देखा न जा सके.
  • सिद्ध होता है कि चुनाव सर्वेक्षण अपनी संपूर्ण सतर्कता की स्थिति में भी अविश्वसनीय ही हैं. हालांकि ऐसे अनुमानों को तरह तरह से वैज्ञानिकता और सैम्पल के साइज़ का तर्क देकर विश्वसनीय दिखा दिया जाता है.
  • चीनी उत्पादन के आंकड़ों के बहाने एक बात तो साफ हो गई कि हर क्षेत्र में सुचारु व्यवस्था के लिए आंकड़ों को जमा करने के अलावा कोई और विकल्प है ही नहीं, इसीलिए हमें यह जान लेना चाहिए कि इन दिनों सांख्यिकीय तथ्यों का मज़ाक उड़ाकर जो सिर्फ शाब्दिक वक्तव्यों का ज़ोर बढ़ रहा है, उस पर भी गौर करने का वक्त आ गया है.
  • जिस दिन नोटबंदी का ऐलान हुआ था तब पता नही चल पा रहा था कि सरकार के मन में क्या है. लेकिन उसके कारणों को अब जरूर समझा जा सकता है. सबको पता है कि अपनी सरकार शुरू से ही जिस तरह की मुश्किल में पड़ी है उससे निजात के लिए उसे बस ढेर सारे पैसे की जरूरत थी, उसी से वादे पूरे होने थे. लेकिन नोटबंदी के जरिए ढेर सारा काला धन बरामद करने में सरकार फेल हो गई
  • आमतौर पर देश के सालाना बजट पर सोचने विचारने का काम डेढ़ दो महीने पहले से शुरू हो जाता था. लेकिन इस साल नोटबंदी ने देश को इस कदर उलझाए रखा कि यह काम रह ही गया. वैसे नवंबर के दूसरे हफ्ते में नोटबंदी करते समय सरकार के सामने इस साल का बजट ही रहा होगा. सबको पता है कि पिछले साल बजट बनाने में सरकार कितनी मुश्किल में पड़ गई थी.
  • राहुल गांधी का भाषण देखकर लगता है कि उन्‍होंने संभवतया आज सुबह अमेरिकी राष्‍ट्रपति बराक ओबामा का भाषण जरूर सुना होगा क्‍योंकि जिस अंदाज में ओबामा ने अपने भाषण में लोकतंत्र, लोकतांत्रिक संस्‍थाओं की मजबूती पर जोर दिया, कमोबेश वैसा ही चिंता भारत के संदर्भ में राहुल के भाषण में भी दिखी.
  • प्रदेशों की राजनीतिक हलचल को देखें तो महत्व और रोचकता के लिहाज से एकदम किसी नेता का नाम सामने नहीं आता. ठहरकर याद करें, तो पीएम नरेंद्र मोदी व कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के अलावा थोड़ी-बहुत नज़र अरविंद केजरीवाल पर पड़ती है.
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