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मायावती का 'मास्टरस्ट्रोक', इस्तीफा देकर पक्की की राज्यसभा सीट

आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने मायावती को बिहार कोटे से राज्यसभा में भेजने का ऑफर कर दिया. साथ ही कांग्रेस ने भी उनका समर्थन कर दिया.

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मायावती का 'मास्टरस्ट्रोक', इस्तीफा देकर पक्की की राज्यसभा सीट

बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) की अध्यक्ष मायावती

खास बातें

  1. राजनीतिक जमीन खिंसकती देख मायावती ने चला दांव
  2. दलितों के लिए आवाज उठाने के नाम पर दिया इस्तीफा
  3. इसी बहाने दलितों के बीच फिर से साख बनाने की कोशिश
नई दिल्ली: बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) की अध्यक्ष मायावती ने सहारनपुर हिंसा पर बहस के लिए समय की मांग के नाम पर राज्यसभा से इस्तीफा देकर राजनीति का मास्टरस्ट्रोक खेला है. लोकसभा के बाद यूपी विधानसभा में बीएसपी के बेहद खराब प्रदर्शन के बाद मायावती की राजनीतिक जमीन खिंसकती दिख रही थी. यूपी विधानसभा में बीएसपी के महज 19 विधायक होने के चलते मायावती के लिए राज्यसभा की नई पारी बेहद कठिन दिख रही थी. इसके बाद भी मायावती ने दलितों के लिए आवाज उठाने के नाम पर इस्तीफा दे दिया. एक तरफ जहां उनका इस्तीफा मंजूर नहीं हुआ, दूसरी तरफ आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने उन्हें बिहार कोटे से राज्यसभा में भेजने का ऑफर कर दिया. साथ ही कांग्रेस ने भी उनका समर्थन कर दिया. यानी उन्होंने राज्यसभा में अपनी अगली इनिंग पक्की कर लीं.

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उभरते दलित नेता चंद्रशेखर को किया चित
सियासी पंडित कहते हैं कि मायावती के दलित वोट में एक तरफ बीजेपी सेंध लगा रही है तो दूसरी तरफ पश्चिम में चंद्रशेखर नाम का एक नया दलित नेता खड़ा हो गया है. ऐसे में अपने खिसकते जनाधार को रोकने के लिए मायावती ने एक बड़ा दांव चला है. 

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"अगर मैं सदन में दलितों की बात नहीं उठा सकती तो मेरे राज्यसभा में रहने पर लानत है. मैं अपने समाज की रक्षा नहीं कर पा रही हूं…अगर मुझे अपनी बात रखने का मौक़ा नहीं दिया ज रहा है तो मुझे सदन में रहने का अधिकार नहीं है. मैं सदन की सदस्यता से आज ही इस्तीफ़ा दे रही हूं." 

संसदीय इतिहास में पहली बार माया ने चला यह दांव
उनके समर्थक कहते हैं कि दलितों पर हो रहे ज़ुल्म को 3 मिनट में नहीं बताया जा सकता था. मायावती ने दलितों की खातिर कुर्सी को ठोकर मार दिया लेकिन सियासत के जानकार कहते हैं कि अगर वह ऊना कांड से लेकर सहारनपुर कांड तक किसी बड़े दलित मुद्दे पर इस्तीफ़ा देतीं तो उसका ज़्यादा असर होता.

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इस मामले में दलित चिंतक डॉ. लालजी निर्मल का कहना है, "समय को लेकर के संसद से त्यागपात्र दिया जाना यह दलित राजनीति के लिए बहुत अच्छे संकेत नहीं हैं. यह संसदीय इतिहास की शायद पहली घटना हो की समय न मिलने के कारण किसी सदस्य ने राज्यसभा अथवा लोकसभा को इस्तीफा दिया हो." 

बीजेपी के मंसूबे पर फेर पानी
मायावती के लिए उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति में नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं. बीजेपी दलित वोट में सेंध की लगातार कोशिश में है. 

अप्रैल 2015 में पीएम नरेंद्र मोदी ने मुंबई में अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर के उद्घाटन किया था. नवंबर 2015 में सरकार ने 26 नवंबर को 'संविधान दिवस' मानने का ऐलान किया. दिसंबर 2015 को अंबेडकर की याद में सिक्के जारी किए. मार्च 2016 में दिल्ली में अलीपुर रोड पर अंबेडकर स्मारक की बुनियाद रखी. अप्रैल 2016 में अंबेडकर जयंती पर सार्वजनिक अवकाश की घोषणा की. जून 2017 को दलित नेता रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित किया. 

दूसरी तरफ पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चंद्रशेखर एक नया दलित चेहरा बन के उभरा है. वहां दलितों में उसकी दीवानगी देखी गई. दिल्ली में जंतर-मंतर पर उसकी आवाज़ पर पहुंचे बड़े हुजूम ने मायावती को झटका दिया है. यही नहीं मायावती को अपनों के जाने का नुक़सान भी हुआ है. उनके क़रीब दर्जनभर बड़े नेता यूपी विधानसभा चुनावों से पहले उनका साथ छोड़ गए थे. 

बहन जी ने खोले गठबंधन के रास्ते
इस मामले में वरिष्ठ पत्रकार बृजेश शुक्ला का कहना है, "मायावती का जनाधार बड़ी तेज़ी से खिसका है. अब उस दलित वोट को जो उनका अपना आधार था, उसको वह पाना चाहती हैं. इसके लिए उनके पास सहारनपुर से बड़ा मुद्दा हो सकता था. अब उनकी चुनौती यह है कि ऐसे उससे अपना जनाधार बचाएं." 

मायावती के इस्तीफ़े के इस मौक़े से भविष्य के गठबंधन के कुछ दरवाज़े खुलते भी नज़र आते हैं. दोनों सदनों में मायावती को इस मुद्दे पर समर्थन मिला. राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आज़ाद ने उनको इस्तीफ़ा नहीं देने के लिए मानने की कोशिश की.

मायावती के इस्तीफे के मायने इस वीडियो में समझें


दिया संदेश, दलितों की असली नेता वही हैं
मायावती की अपनी ताक़त भी कमज़ोर हुई है. उनके पास लोकसभा में कोई सांसद नहीं है. राज्यसभा में सिर्फ़ 6 हैं और यूपी विधानसभा के इस चुनाव में उनकी पार्टी के सिर्फ़ 19 विधायक हैं. कमज़ोर पड़ी ताक़त उन्हें गैर बीजेपी गठबंधन का हिस्सा बना सकती है.

वरिष्ठ पत्रकार बृजेश शुक्ला कहते हैं, "सारा मामला यह है कि वो उससे बड़ी लकीर खींच देना चाहती हैं और यह संदेश देना चाहती हैं कि दलितों के हित के लिए सिर्फ़ वही सोचती हैं और दूसरी बात यह है कि वो विपक्ष में अपनी स्थिति मज़बूत करना चाहती हैं जिससे यदि कोई समझौता होता है तो उनकी लकीर बड़ी रहे."


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